कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 351, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर साहबकी शिक्षा ।
तीन कालके जितने धर्मके अगुवा हैं, हुए तथा होंगे, उन सबसे कबीर साहबकी शिक्षा जुदी है । इस शिक्षाका मुख्य अभिप्राय यही है कि, गर्भका आवागमन बंद हो इसका बड़ा भारी दुःख है । जिस शिक्षा तथा धर्मसे बारम्बार जन्म और मृत्युका दुःख दूर हो उसीको ग्रहण करना वही मनुष्यका धर्म है । उसी गुरु तथा शास्त्रको धारण करना मानुषिक बुद्धिका कर्तव्य है । जो कोई मनुष्य देह पाकर मुक्तिमार्ग न ढूँढ़े वो बड़ा अभाग है । क्योंकि, वह फिर ऐसा समय न पावेगा । सदा ही भवसागरमें डुबकियाँ खावेगा । योगयुक्ति तथा सारे तंत्र मंत्र बंधनके प्रधान कारण हैं । यदि योग समाधिसे योगी अमर हो जाता तो फिर कदापि कोई योगी न मरता । इस समयभी सब नजर आते । असंन्यासी तो ब्रह्मके ध्यानमें रहते हैं उनका भ्रम ब्रह्म है । वे भ्रमरूप होकर आवागमनमें पड़े रहते हैं उनका ब्रह्म भ्रम हो उसीमें फँसे रहते हैं ब्रह्म यम शिव सनकादिक इत्यादि सभी भ्रमकी नदीमें पड़े हुए डुबकियाँ खारहे हैं । इस भ्रमकी कोई सीमा नहीं है ।
सूक्ष्म वेदके बिना पढ़े किसीकी मुक्ति नहीं होती । जो कोई ध्यानपूर्वक पढ़े, एवं उसके सारे विषयोंपर विचार करे, उसकी आज्ञाओंपर भली-भाँति दृढ़ हो, समस्त मिथ्यओंसे पृथक् हो, वही मनुष्य है । वही कालपुरुषके पञ्जेसे छुटकारा पावेगा । कञ्जूस, कामी, व्यभिचारी पुरुषको सूक्ष्मवेदके पढ़नेसे किसी प्रकारका भी लाभ नहीं होता है ।
अपने गुरुको स्वयम् सत्यपुरुष करके जाने । गुरुके मुँहसे सत्यपुरुष स्वयम् खाता पीता है । गुरुके शरीरसे वस्त्रादि पहनता है जिसको गुरुकी बातपर विश्वास न होवे । जिसके मनमें घमंड हो, तथा जिसके मनमें नम्रता न हो वह नरकमें जावेगा । सेवा सब पुण्योंसे बड़ा चढ़ा पुण्य है । गुरुकी सेवाका कर्तव्य सबके ऊपर है । जो गुरुकी पूरी सेवा करेगा, उसका हृदय प्रकाशित होगा । गुरुकीही मूर्तिसे पारख गुरु निकलकर उसकी सारी कामनाओंको पूरी करेगा । कोई अपने गुरुके कर्तव्य पालन न करे, उससे पालन करावे, गुरुकी दी हुई वस्तुओंको भोंगे तो वह चोर और ठग है । एक अवस्थामें गुरुकी सेवा न भोंगी जावेगी जबकि, मनुष्य भली-भाँति डूबा रहे, दिन-रात वंदनामें संलग्न हो जावे, किसी दूसरी ओर ध्यान न हो, अपने शरीरकी चिन्ता भी न हो उस समय गुरु सेवाकी क्षमा होगी । गुरु उसकी वंदनका भागी होगा । जबतक ऐसी अवस्था न हो तब तक गुरुसेवासे अपनेको वो बचायेगी तो उसके मनमें तेज न चमकेगा । इस कारण सारे जीवन गुरुकी सेवा एवं आज्ञामें रहना उचित है । क्योंकि, गुरुके प्रति अपना कर्तव्य