भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 395

मोटा है जैसे कि, भोगी धनियोंका हो, क्योंकि, बिना भोगके शरीर इतना मोटा कैसे रह सकता है ? आप तो शरीरके लिये भी कोई उद्योग नहीं करते । प्रह्लादजीके बचन सुनकर दत्तात्रेयजीने उत्तर दिया कि, भगवानकी कृपासे अनेक जन्मोंके पीछे मोक्षका द्वार यह मनुष्य देह मिला है । सुख पानके लिये घर गृहस्थ किया करते हैं परन्तु सुखकी जगह दुख देखकर यहाँ एकान्तमें आ बैठे हैं । आत्मप्रकाशका घातक तथा अवास्तविक समझ भोग तथा उद्यमका त्याग करके प्रारब्धपरही सन्तोष कर लेता हैं । सदा स्वरूपमें स्थिर रहकर सबको भुलाये रहता हैं । मुझे मौहरकी मखली और अजगरकी चव्या उत्तम लगी । उसी तरह उस प्रेम मदिरासे परितृप्त हुआ सदा यहीं रहा करता हैं । इसके सिवा और भी लोकोपकारिणी बात हुई जिनपर आरूढ़ होकर मनुष्य उत्तम लोकोंको पा सकता है । वे सब पुराण ग्रन्थोंमें विस्तारके साथ लिखी हुई हैं । प्रेम मदिराके दीवानोंका प्रकरण लेकर यहाँ थोडासा लिख दिया है ।

सनत्कुमार

ये परम भागवतोंमें हैं । इन्होंने निर्द्वन्द्व रहनेके लिये सदा बाल्यावस्था ही स्वीकार की है, ये किसीभी लोकमें आ जा सकते हैं, इनकी गति कहीं भी रुकी हुई नहीं है । हैं ये छोटेसेकी तरह रहनेवालेपर इनका ज्ञान यहाँतक बढ़ा हुआ है कि, नारदजीको भी इन्होंने उपदेश देकर सत्य पुरुषकी भक्तिमें लगाया था । ये सदा उस सुखका अनुभव करते हैं जिसकी कि, एक मात्रामें सारा संसार तृप्त रहता है । इनके जीवनकी अनेकों घटनाएँ उपनिषद् और पुराणोंमें भरी पड़ी हैं । जिन्हें इच्छा हो वो उठाकर देखलें, ये भी परा भक्ति, रूपा प्रेम मदिराको कबीर साहिबके कथनानुसार निकालकर पिये हुए मस्त दीवाने हैं ।

भवतबालक ध्रुव ।

विष्णुपुराणमें ध्रुवजीका वृत्तान्त इस प्रकार लिखा है कि, ध्रुवजी राजा उत्तानपाद चक्रवर्तीके पुत्र थे । जब ध्रुवजीका वय पाँच वर्षका था उस समय अपने पिताके गोदमें सिंहासनपर जा बैठे । उस समय ध्रुवजीकी सौतेली माता राजाके निकट बैठी थी । उसने ध्रुवजीको एक ऐसा थप्पड़ मारा कि, आप पृथ्वीपर गिर पड़े और कहा कि, तू सिंहासनारूढ़ होने योग्य नहीं । यदि तेरे भाग्यमें राज्य अथवा सिंहासन होता तो तू मेरे गर्भसे उत्पन्न होता । तब ध्रुवजी रोते २ अपनी माताके समीप गए और अपनी माताके व्यवहारका विवरण किया । तब ध्रुवकी माताने अपने पुत्रको गोदमें ले लिया और मुख चूम तथा प्यार करके कहने लगी कि, ए पुत्र ! इस संसारमें तेरा कोई नहीं । एक प्यारे परमेश्वरके अतिरिक्त तेरा कौन हैं ? तू उसीकी भक्ति कर । तब माताकी शिक्षासे ध्रुवजी