भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 396

तपस्याके निमित्त बनको चले । राजा उत्तानपादने सुना कि, ध्रुव बनको जाता है, तब लोगोंको भेजा कि, ध्रुवको समझाओ, परन्तु ध्रुवने किसीका कहना न माना और बनको सिधारे, वहाँ उनको ऋषियोंका उपदेश मिला, एक अँगूठे पर अपने शरीरका समस्त बोझ देकर खड़ा हो गया । छः महीने पर्यन्त बराबर खड़ा रहा, सब अन्न जल छोड़ दिया, केवल वायुही उसका भोजन था । इस अवसरमें राजा इन्द्रको अत्यन्त भय उत्पन्न हुआ कि, ध्रुव ऐसी कठिन तपस्या कर रहा है ? मेरा राज्य न छीनले । ध्रुवजीको अनेक प्रकारके त्रास दिखलाने लगा, जिससे तपस्या छोड़कर भाग जावे, परन्तु ध्रुवजी तनिक भी नहीं भयभीत हुए । व्याघ्र सर्प अग्नि और राक्षस इत्यादि पशु जो उन्हींने देखे सबमें विष्णुको जाना दूसरा कुछ न जाना, तब विष्णुकी कृपा हुई नील वर्ण घनश्याम चतुर्भुज शंख चक्र गदा पद्म इत्यादि लिए, गरुडपर सवार हो ध्रुवजीके सामने आकर कहा कि, माँग क्या चाहता है ? ध्रुवजीने कहा कि, ए महाराज ! अटल पदकी श्रेणी दीजिये, जहाँसे मैं कभी न गिर्छूँ । विष्णुने आज्ञा देदी कि, अभी तो तू राज्य कर फिर शरीर छोड़कर अटल पद पावेगा । जबलें पृथ्वी तथा आकाश है तबलें तू अटल रहेगा । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रादि सब तेरे चारों ओर फिरा करेंगे । फिर विष्णुने कहा कि और जो कुछ माँगेगा मैं तुझको दूंगा । तब ध्रुवने कहा कि, मुझे आत्मज्ञान प्रदान करो जिसके बलसे मैं यह जान सकूँकि, मैं क्या हूँ । तब विष्णुने कहा कि, ए ध्रुव ! यदि मैं तुझको इस प्रश्नका उत्तर देता हूँ तो मैं और अटल पद तीनों मिथ्या ठहरते हैं । इस कारण तुमको इस प्रश्नका उत्तर सन्त देवेंगे । इतना कहकर विष्णु तो चले गए । उसके उपरान्त तीन सन्त ध्रुवजीके समीप आए ; वामदेव, पराशर और दत्तजी । तब दत्तजीने कहा कि, ए ध्रुवजी ! तू अटल पदसे पृथक् है । तूने अटल पद क्यों माँग लिया ? ए मूर्ख ! तू सोच समझ कि, जब तू नहीं रहेगा तब अटल कहाँ रहेगा । आत्माको तो मृत्यु नहीं है । शरीर तो जैसे नवीन कपड़ा पहना और प्राचीन छोड़ दिया, इसी तरह है । तूने अपनेको अटल पदके बन्धनमें क्यों डाल दिया, जब उन श्रेष्ठपुरुषोंकी शिक्षासे ध्रुवको ज्ञान हुआ और अटल पदको मिथ्या जान लिया, तब पछताया । अटल पदके बखेड़ेसे मनको हटाकर सदा पराभक्तिमें लीन रहने लगा, इसकी दिव्यचर्या लोगोंको भक्तिका पाठ सिखानेवाली है । अब आप अटल पदपर विराजे हुए भी प्रेम मदिरामें मस्त रहा करते हैं । यहाँ तक कि, आपकी दीवानगीके गुण स्वयम् कबीर साहिबने भी गाये हैं ।