भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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भक्त प्रह्लाद ।

विष्णुपुराणमें लिखा है तथा कबीर साहबका भी कथन है कि, जब प्रह्लादजीका वय सात वर्षका हुवा तब प्रह्लादका पिता जो कि, हिरण्यकशिपु था । वह बड़ा वेदान्ती था और कहता था कि, मैं स्वयम् परमेश्वर हूँ । दूसरा कौन है । सबसे अपनी पूजन करवाता था । प्रह्लाद उसका पुत्र बड़ा भक्त था । राम २ कहा करता था, कबीर साहबका वचन है कि, जब यह प्रह्लाद अपनी माताके गर्भमें था, तब नारदजीने उसकी माताके गर्भमें जाकर उसको रामनामकी दीक्षा दी थी । भक्ति सिखलायी थी ।

जिस समय यह प्रह्लाद अपनी माताके गर्भमें आया तब राजा इन्द्रको अत्यन्त भय उत्पन्न हुवा । कारण यह कि, इन्द्रने पूर्वही सुन रक्खा था जो हिरण्यकशिपुका पुत्र उत्पन्न होगा वह इन्द्रासनपर बैठकर राज्य करेगा । इस भयसे राजा इन्द्रने यह युक्ति की कि, जब प्रह्लाद गर्भमें आया तब वह प्रह्लादकी माताको चुराकर निज लोकमें ले गया । चाहा कि, गर्भ गिराकर बच्चाका वध करें । तब नारदजीने इन्द्रको समझाकर कहा कि, तुम ऐसा कार्य कदापि न करना इस स्त्रीके गर्भसे भक्त उत्पन्न होगा, वह सब सुखोंका देनेवाला होगा । तब नारदजीके कहनेसे इन्द्रने मान लिया । वह स्त्री पुनः अपने गृहमें आई । उसके गर्भसे प्रह्लाद उत्पन्न हुआ । सातवर्षके वयमें पिताने प्रह्लादको पढ़नेके लिए बँठाया । तब आप कुछ न पढ़ते थे केवल राम राम कहा करते थे । स्वयम् तो प्रह्लाद राम राम कहतेही थे पर समस्त पाठशालाके लड़कोंको भी सिखला दिया जिससे पाठशालाके समस्त छात्र राम राम कहते हुए प्रेममें मग्न हो गए । सभीने पढ़ना छोड़ दिया, पढ़नेकी ओरसे ध्यान छोड़ दिया । पण्डित राजा हिरण्यकशिपुके समीप दोहाई देते हुए कहने लगे कि, ऐ राजा ? प्रह्लादने पाठशालाके समस्त बालकोंको बहका दिया । न स्वयं पढ़ता है और न दूसरोंको पढ़ने देता है समस्त बालक राम राम कहनेके आनन्दमें मग्न हो रहे हैं । यह बात सुनकर हिरण्यकशिपुने प्रह्लादको बुलाकर समझाया कि, ए पुत्र ! तू पढ़, कारण यह कि, तू ही मेरे सिंहासनपर आरूढ़ होनेवाला है । तब प्रह्लादजीने उत्तर दिया कि, ए पिता ! मैं न पढ़ूंगा, न राज्य करूँगा, मैं तो राम राम कहूँगा, किसी वस्तुकी मुझको इच्छा नहीं है । तब हिरण्यकशिपुको अत्यंत क्रोध आया और कहा कि, मैं शिव हूँ, मेरे अतिरिक्त और दूसरा कौन है, प्रह्लादने तो रामनामके प्रेमका प्याला पीलिया था । पिताकी बात कौन सुने, राम राम कहनेसे न हटते थे । इस कारण पिता तथा पुत्रमें महा विरोध उत्पन्न हुवा, हिरण्यकशिपुने