भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 433

के (२६) (२७) (२८) बाबमें डेरे परदे और छत इत्यादिकी युक्तियाँ और बलिप्रदानोंकी समस्त प्रथाएँ बतलाता है । बेल और भेड़ोंको जबहू करके बलिप्रदानस्थल और उसके चारों ओर रक्त छिड़कनेकी आज्ञा देता है । फिर परमेश्वर बालके स्तम्भमें उतरकर मूसाके समक्ष दण्डायमान हो मित्रोंके सद्गृह अलाप करने लगा ॥

मूसाकी तीसरी पुस्तक एखबारका — (१) बाब (१) आयतपरमेश्वरने मूसाको बुलाया । झुण्डके डेरेसे उससे कहने लगा कि, बनी इसराईलसे कह कि, यदि तुममेंसे कोई परमेश्वरके निमित्त बलिप्रदान लाया चाहे तो निर्दोष गाय, बेल, बकरी, भेड़ लाकर परमेश्वरके बलिप्रदान स्थलके सामने बलि देवे उनके रक्त छिड़के, उसको बलिप्रदन देवे । अर्थात् सुगंधि अग्निसे परमेश्वरके निमित्त हो यदि पक्षियोंमेंसे हो तो कुमरी कबूतरके बच्चोंमेंसे बलि लावे काहून उसको बलिस्थानमें लाकर उसका गला मिरौड डाले । उसको बलि देनेके स्थानपर जला देवे । उसके रक्तको दीवारपर निचोड़े । जलानेवाला बलि परमेश्वरके निमित्त हो जो जबहूकी हुई लाश जलनेसे बचजावे उसपर काहूनका स्वत्व है अत्यंत पवित्र है । यहाँ भाँति २ के बलिप्रदानका विवरण चला आता है । जिनके द्वारा मनुष्यों के पापोंका मोचन हो । (९) बाब (२२) आयत मूसा, हारूँ और उसके भाईने झुण्डकी ओर अपना हाथ उठाया । उनको आशीर्वाद दिया । दोषकी कुरबानी जलकी कुरबानी और रक्षाकी कुरबानी देकर नीचे उतरे । फिर मूसा और हारूँ झुण्डके डेरेमें प्रवेशित हुए । बाहर निकले झुण्डको आशीर्वाद दिया । तब समस्त झुण्डके समक्ष परमेश्वरका प्रताप प्रगट हुवा । परमेश्वरकी सेवामेंसे अग्नि बहिर्गत हुई, बलिप्रदानस्थली कुरबानी और चरबीको खागई ।

मूसाकी चौथी पुस्तक गन्तीमें विस्तारके साथ लिखा हुआ है । कि— परमेश्वर बादलके खंभोंमें आकाशसे उतरता मूसा के डेरेके सामने खड़ा होकर तथा वार्तालाप करके चला जाया करता था अब मूसाने अपने स्थानपर एशूहको स्थिरका युद्धकी आज्ञा दे लाखोंको मार डाला तथा बलआमको भी मारा । मेदियों के पाँच बादशाहों और उनकी सैन्यको मिटाकर महा रक्तपात कर कनआनके राज्यको करकवलित किया । परमेश्वरने उन दोनों पुस्तकोंमें समस्त धार्मिक प्रथाएँ बतलाई, मदिरा पान तथा मांसाहारकी आज्ञा दी ।

मूसाकी पाँचवी पुस्तक इस्तसना—नामकमें मूसाकी समस्त धार्मिक आज्ञाएँ पूरी हुई । तब मूसा मवाबके मैदानमें नीबू पर्वतपर चढ़ मर गया । यहूदी मूसाके दुःखमें तीन दिवसोंपर्यन्त रोते रहे मूसा एकसौ बीस वर्ष का वयस पाकर मरा ।