भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 443

गाय बधे तँहि तुरका कहिये, उनते वेका छोटे ।
कहाँहि कबीर सुनो हो सन्तो, कलिके ब्राह्मण खोटे ॥ ५ ॥

कबीर दासजी वाममार्गी देवीकी पुजारीकी ओर लक्ष्य करके कहते हैं कि, ए महात्माओ ! यह पाण्डे कसाईसे भी चतुर मालूम होता है । बकरेकी तो सदाही बलि देता रहता है पर मोके झोके भेंसाके मारनेका भी इरादा करता है । स्नान करके लाल तिलक दे, सिद्ध बनके बैठ जाता है, देवीको बड़े ढोंगके साथ पुजाता है । जो अपने भीतर है वही उसकेभी भीतर है इस बातका ख्याल न करके सपाटसे जीव बध करके लोहूकी नदी बहा देता है । जब कभी सभामें बैठता है तो अपनेको अतिपुनीतकुलमें मानकर सभामें अपनेको कौल कहता हुआ बलिका माहात्म्य प्रकट करता है । जमाना इनका चेला होनेको चलता है, पर मुझे इसकी हँसी आती है, कथा तो सुनाते हैं पाप नाश करनेके लिये, पर काम करते हैं पापके पहाड़ोंका । ऐसे गुरु चले दोनों डबते देखे जाते हैं हाथ पकड़कर यमराजने दोनोंको जीव हत्याके फल भोगनेके लिये खींच लिया है । जो गाय मारते हैं वे तुर्क हैं भेंसा बकराके मारनेवाले क्या इनसे कम है । पहिले ऐसे ब्राह्मण नहीं थे कबीर कहते हैं कि, कलियुगके ऐसे ब्राह्मण जो ब्राह्मण शरीर पाकर जीवहत्या करें वे महा बुरे हैं । इस तरह कबीर साहिबने और भी अनेकों वचनोंमें बलि या कुर्बानीका निषेध किया है । वे हिन्दू मुसलमान दोनोंके लिये अनुचित समझते हैं ।

समस्त सूक्ष्मवेद इस विषयमें बराबर यह बात प्रगट करता चला आता है कि, रक्तपात कालपुरुषकी ओरसे है । तुम इस पापसे रूको परन्तु लोग नहीं हटते थे । कबीर साहबके साथ वँर करते, कहना न मानते, ऐसा विष और मंत्र कालपुरुषका समस्त जीवोंपर चढ़ रहा है । कि, कोई जीव सत्यपुरुषकी भक्तिको अच्छा नहीं समझता है । कालपुरुषकी ओर आपसे आप दौड़ता है । जैसे नीमके कीड़ेको नीमही पसंद है । वह मिसरी चीनी आदिको अच्छा नहीं समझता । सब जीव कामनाकी वासनामें फँसकर काम क्रोध लोभादिके प्रपञ्चोंमें फँस रहे हैं । समस्त जीवोंकी नस नसमें कालपुरुषका विष समा रहा है । बिना सत्यगुरुकी दयासे वह विष उनके भीतरसे न निकलेगा । कालपुरुषके पुत्र कालपुरुषके बनाये नियमोंपर समस्त मनुष्योंको आरूढ़ करते जाते हैं । हाँक मार मार कर समस्त मनुष्योंको फँसाते हैं, समस्त मनुष्य उनके धोखे और धूर्तताको देखते सुनते हैं तथापि उसी पथपर चले जाते हैं । फिर उनको क्या कहिये ? मनुष्यतासे बहिर्गत कहिये अथवा मनुष्य कहिये ? जो लोग जान-