भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सुन तो रहे हैं पर नहीं सुनते । उनके हृदय बुद्धिपर ताला लग रहा है, बिना सत्यगुरु कबीरकी शरणके ताला कदापि न टूटेगा ।

जो ठग है उसको अपना दयालु मित्र समझते हैं । अज्ञान बालक ठगको कैसे पहचान सकता है, हों जब कोई दयालु मित्र मिले हृदयसे सचेत तथा पथसे विज्ञ हो वह भी अपने पथदर्शकके विरुद्ध काम न करे । कारण यह कि, कृतज्ञतासे बढ़कर और कोई अच्छी भलाई नहीं है । जो कोई गुरुका आज्ञाकारी होगा वही छुटकारा पावेगा । समस्त धोखाओं और दगाबाजियोंको देखकर दूर भागे । जहाँ सत्यता हो उसको तुरंत स्वीकार करे, तनिक विलम्ब न करे । बुद्धि और ज्ञानके बससे सबकी यथार्थताको जाने । जहाँ धोखा हो वहाँसे दूर भागे । जब धोखे और धूर्तताको न पहचाना तो अवश्य मारा गया ।

समस्त संसारकी पुस्तकें कोई क्यों न पढ़ा करे उसके मनमें कदापि प्रकाश न दौड़ेगा । परन्तु जब सूक्ष्मवेद या अध्यात्मशास्त्रकी ओर मन फिरेगा तबही मनको संतोष आवेगा, स्थिरता होगी । जितने वेद और पुस्तकें हैं, कोई अंधकारसे पृथक् नहीं कर सकती । परन्तु केवल सूक्ष्मवेद अंधकारसे बहिर्गत होता है जो कोई सूक्ष्मवेद समझ, बूझकर अपने गुरुसे पढ़ेगा उनकी सूक्ष्मवातोंको पहचान लेगा सत्यगुरुको पहचानेगा अपने गुरुकी सेवा तथा सत्कारको अपने शिरधारण करेगा उसको अवश्य कबीर गुरु मिलेगा जो कोई अपने गुरुसे खिंचा रहेगा उसको अपने सत्यगुरुका दर्शन कदापि न होगा । गुरुकी सेवा तथा आज्ञा मानना सत्यगुरुकी दयापानेका मार्ग है, गुरुहीकी दयासे सत्यगुरुकी दया है । मुक्ति पानेका यही मार्ग है और गुरुका क्रोध दुर्भाग्यका चिह्न है ।

बुद्धिमानोंकी बुद्धिमानियाँ और वैद्योंकी युक्तियाँ चतुरोंकी चतुराई किधर गई ? किस पेचीले गड़हेमें डूबकी खाते फिरते हैं । और सावधानोंकी सावधानियाँ चालाकियों की चालाकियाँ किस कुएँमें जा पड़ीं कि, वे तनिक भी नहीं विचारते । तनिक भी नहीं जान सकते कि, परमेश्वर बड़ा स्वच्छ तथा दयालु है वह किस प्रयोजनसे ऐसा अशुद्ध कार्य करावे, यानी व्यर्थही निर्दोषी जीवोंका प्राणघात करावे । उनका रक्त बलिप्रदानस्थलीपर छिड़कावे । उनका माँस तथा चरबी खावे, गह परम दयालु परमेश्वरका कार्य तो कदापि नहीं हो सकता, यह तो किसी राक्षसोंके परमेश्वरका हो सकता है ऐसे भयानक परमेश्वरसे जो अपने मुक्तिकी आशा रखते हैं क्या उन लोगोंकी बुद्धि ठिकाने है ? कदापि नहीं । देखो वे लोग जिसको पूजते हैं वे कौन हैं ? निश्चरोंमें और उनमें क्या भेद है ? वैष्णव बलि आदिकी बुराईयोंसे कोसों दूर हैं, पर व्यवहारका