कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 483, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंथाली लोटाको जूँठा पाकर बडाही क्रुद्ध हुआ । मीरमाधवको मार कूटकर थाली लोठा ले आया । जब स्नान करके ठाकुर पूजने गया मन्दिर द्वार खोला तो देखा कि, ठाकुरोंकी बुरी दशा है । मूर्तिपर धूल पडी है कपडे फटे हैं । बडे दुःखमय आकारमें दिखाई दी । यह अवस्था देखकर पुजारी बडा चिन्तित हुआ । इसी सोचमें पुजारी जब रातको सो गया तब ठाकुरने स्वप्नमें कहा कि, मीरमाधवको जो तुमने मारा सो समस्त मार मुझपर पडी । मीरमाधवसे मुझमें तनिक भेद न समझो । प्रातःकाल होतेही वह पुजारी मीरमाधवके चरणोंपर गिरकर अपने अपराधको क्षमा कराया ।
मिरजा खुशदिलका भी ऐसाही वृत्तान्त है भक्तमालमें देखो ।
नरसीभक्त मग्न होकर ठाकुरके सामने नाच रहे थे । उनकी स्त्री भी नाचने लगी । पुत्री भी नाचने लगी । इन तीनोंको प्रेममें नाचते देखकर मूर्तिमेंसे कृष्णजी भी निकलकर उनके साथ नाचने लगे । नरसीकी कामना पूर्ण हुई ।
पीपाजी द्वारकाको गए । उनकी स्त्री साथ थी, लोगोंसे पूछा, पहली द्वारका कहाँ है ? तब डोंगोपर चढ़ाकर मल्लाह ले गया । जहाँ पहली द्वारका समुद्रमें डूब गई थी वह स्थान दिखलाया । देखतेही पीपाने समुद्रमें बुडकी मारी । पीपाके कूदतेही पीपाकी स्त्री भी समुद्रमें कूद पडी । जब वे दोनों जलके गर्भमें चले गए तब उनको वहाँ असली द्वारका दिखाई दी । कृष्णचन्द्रने अपने एक हाथपर पीपा और दूसरे हाथपर सीताको लेकर कुछ दिवसोंपर्यन्त अपने पास रक्खा । फिर कहा कि, अब तुम पृथ्वीपर जाओ । यद्यपि पीपाने बहुत कहा कि, अब मैं जाना नहीं चाहता पर कृष्णजीने कहा कि, तुम निश्चय जाओ । पीछे छाप देकर कृष्णजीने पीपाको बिदा किया । पीपा भक्तकी छाप आज भी द्वारिकामें प्रसिद्ध है ।
एक वेश्या वैरागियोंके उपदेशसे ठाकुरसेवामें लगी । उसने बडे प्रेम सहित कई सहस्र रुपया लगाकर एक मुकुट बनवाया । वह मुकुट लेकर ठाकुरके शीशपर धरना चाहा, पर ठाकुरकी मूर्ति बहुत ऊँची थी । उसका हाथ वहाँलों नहीं पहुँचा । तब ठाकुरकी मूर्तिने अपना शिर झुका दिया । उस कुँजडीने ठाकुरके शीशपर मुकुट रख दिया । सुनते हैं कि उस मूर्तिके शिर अभीतक झुका हुआ है ।
नामदेव और धन्ना भक्तको मूर्तिमेंसे ठाकुर प्रगट हो गए और बिटठल देवको कुत्तेमेंसे प्रकट हो दर्शन दिये ।
तुलसीदासजी वृन्दावन गए तब राधेकृष्णको दण्डवत् प्रणाम नहीं किया ।