भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 484

कहा कि, यदि यह सीतारामकी मूर्ति हो तो मैं दंडवत् करूँ । तुलसीदासके देखतेही देखते वह राधेकृष्णकी मूर्ति सीता रामकी हो गई । तुलसीदासजीका—

दोहा—कह वारणो छवि आज का, भले वने हो नाथ ।

तुलसी मस्तक तव नवे, धरो धनुष शर हाथ ॥

कित मुरली कित चंद्रिका, कित गोपिनको साथ ।

तुलसी जिनके कारणें, नाथ भये रघुनाथ ॥

सैन भक्तके निमित्त ठाकुरने नाऊ बनकर राजाकी सेवा की । ऐसे सहस्रों उदाहरण हैं ।

संन्यासी विष्णु और शिव दोनोंको एक स्वरूप जानते हैं । विष्णुकाञ्ची और शिवकाञ्चीका विवरण है कि, विष्णुकाञ्ची जो आचारी हैं वे शिवका दर्शन नहीं करते । एक दिवस एक संन्यासी विष्णुकाञ्चीमें जाकर विष्णुकी मूर्तिके सामने शिवस्तुति करने लगा । तब उस विष्णुमूर्तिके मस्तकमें शिवलिङ्ग निकल पड़ा । जब वह संन्यासी मन्दिरके बाहर निकल गया तब लोगोंने देखा कि, ठाकुरकी मूर्तिके मस्तकमें शिवलिङ्ग निकला हुआ है । तब आचारियोंने कोलाहल मचाया कि, यह क्या हुआ ठाकुरके शिरमेंसे शिवलिङ्ग निकल पड़ा । इस संन्यासीको दृढ़कर ले आये और बहुत कुछ प्रार्थना की कि, इस बुराईको विलोपित करो । तब उस संन्यासीने विष्णुके सामने दंडायमान होकर विष्णुकी बड़ी स्तुति की तो शिवलिङ्ग विलोपित हो गया । केवल विष्णुमूर्ति रह गई ।

एक प्रामाणिक पुरुष द्वारा प्रगट हुआ है कि, अम्बाला प्रांतके शाहाबादमें कितने मन्दिर और कितने समाधालय दिखाई दिये—वहाँपर किसी श्रेष्ठ पुरुषकी क़ब्र थी । उस क़ब्रपर शिवलिङ्ग था । मुसलमानलोग उस लिङ्गको भङ्ग करने लगे । तब उस शिवलिङ्गसे ऐसी रक्तधारा प्रवाहित हुई कि, समस्त मनुष्य भयभीत हुए । उन लोगोंकी इच्छा हुई कि, उस लिङ्गको खोदकर फेंक दें । तब उन लोगोंने सौ गजपर्यंत खोदा, पर उस लिङ्गकी हद नहीं मिली । तब विवश होकर उसको छोड दिया । अब हिन्दूलोग उसको पूजते हैं ।

सन् १८५५ ई० की यह बात है और यह आश्चर्यमय व्यापार देखकर सबलोग चकित रह गए ।

सन् १८१० ई० में सहारनपुर जिलेके अन्तर्गत पठानपुरामें एक आलयसे शिवलिङ्ग निकला । वह आलय मुसलमानका था । मुसलमानलोग वैसे उसपर भ्रष्ट जल डालते । उन लोगोंने सौ हाथपर्यन्त खोदा । उसको मकानसे

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