भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 567

हम सब चले आए हैं । महाराज ! इसको अभी मारो । हम सत्य बात कहते हैं, नहीं तो यह सबको मार देगा, हम मारे जायेंगे ।

राजाने कहा कि, प्रथम विचार देखें पीछे उसका रक्तपात करेंगे । ब्राह्मणोंको बुलाया विचार किया गवाही पूछी । इतनेमें ज्ञानीजीने एक ऐसा कौतुक दिखाया कि, समस्त महल सुवर्णका हो गया । जो राजाके द्वार थे वे सब सोनेके हो गये । वे हीरे, लाल, जवाहरात इत्यादि जड़े हुए हो गए । सब कँगूरें भी सुवर्णके हो गए । यह कौतुक देखकर राजा बड़ाही आश्चर्यान्वित हुआ । राजाके मनमें विवेक आया । उसको निश्चय हो गया कि, यह तो कोई महाश्रेष्ठ पुरुष है । राजाने पूछा कि, आप कौन पुरुष हो ? आपने मुझको दर्शन दे कृतकृत्य किया है । तब ज्ञानीजी बोले कि, हम सत्यपुरुषके अहंसी हैं, मनुष्योंके मुक्तिप्रदानार्थ संसारमें आये हैं । सत्यलोक सत्यपुरुषका है । उसको कोई नहीं जानता । हे राजा ! यमके जालको पहिचानो, हमारे शब्दको परखो नहीं तो तुमको काल खा जावेगा । राम राम जो जपते हो उस विधिसे जपो । यदि अपनी भलाई चाहते हो सत्यगुरुकी शरणमें आओ । भ्रम छोड़कर सेवा करो, सब अच्छे अच्छे गुण धारण करो । जब उस सत्यपुरुषके लोकमें जाओगे उसकी शरण प्राप्त करोगे तब तुम्हारा आवागमन छूट जावेगा । पुरुषकी आज्ञासे हमने तुमको दर्शन दिया है । हे राजा ! तुम अभिमान छोड़ो दूढ़ होकर भक्तिमें लीन हो । राजा, रानी, बेटा, बेटी, सब पान लो पुरुषके नामकी आरती करो । तिनका तोड़वाओ सुरति अङ्गका बीड़ा लो, जिससे तुमको काल न छुवे । जिसके घरमें सत्य गुरु पदार्पण करें वह बड़ा भाग्यवान् है । हे राजा ! विलम्ब न करो मन चित्त लगाकर भक्ति करो । तब राजाने बदनाका बाँह पकड़कर महलमें ले गया । तब कहा मैं बड़ाही भाग्यवान् हूँ, क्योंकि मैं महापापी था । परन्तु आपने मुझको बचा लिया । हे प्रभु ! अब मेरे तीनों ताप छूटे । रानीने भी सत्य-गुरुके चरण धोए, बड़ी स्तुति करके कहा कि, आपके वचन सूर्यसम अज्ञान तिमिरको नष्ट करनेवाले हैं । मुक्तिके देनेवाले तथा सबके तारनेवाले हैं । जो नम्र हैं उनके दुःखको दूर करनेवाले भवसागरकी अग्निको बुझानेवाले हैं । सुवर्णकी थाली और झारीसे राजा रानीने सत्यगुरुका चरण धोकर चरणामृत माथेसे लगाया, सारे घरके लोगोंने सत्यगुरुका चरणामृत लिया तथा दण्डवत्की ज्ञानीजीका वचन सुनकर राजाने भली भाँति निश्चय करके कहा कि, हम और पुरुषको नहीं जानते हैं । आपही पुरुषरूप हो । रानी बोली कि, साहब मेरे निमित्त ही आये हैं, मेरी मनकामना पूर्ण हुई है, शीघ्रही शरण लेकर कालसे बचना