कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 568, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाहिये । ज्ञानीजी बोले कि, हे राजा ! तुम सब कुछ छोड़दो । काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहङ्कार, सर्व संसार और माया, कालका पसारा है । इस हेतु संगांरको छोड़कर शब्दको ग्रहण करो । जिससे फिर जन्म मरण न होगा । स्वर्ग नरकको न भरमोगे, अजर अमर घर पाओगे, जो कोई शब्द न मानेगा उसको काल खा जावेगा । मोहकी नदी भारी है । इससे पार जाना कठिन है । पार उतारनेके निमित्त केवल सत्यगुरु भल्लाह है, उसीके साथ पार उतरना हैं । तब राजा बोला, हे सत्यगुरु ! आपके चरणकमलमें मन कैसे टिकाऊँ ? कैसे राज्यका मद उतरे ? कैसे पाखण्डको छोड़ूँ ? बड़प्पन और चतुराई कैसे दूर हो ? हँसी मसखरी नाना प्रकारके छूत, भोग विलास तथा मिथ्या भाषण, जाति, पांति कुल, परिवार, सुवर्ण-मन्दिर, सुख विहार किस प्रकार छोड़ दूँ ? सत्यगुरुने कहा कि, यह सब छोड़कर पुरुषके निकट चलो । राजा बोला कि, अपने शरणमें रखो मेरे माथे पर हाथ धरो, मुझे पापीको बचालो । मैंने सब छोड़ा, सर्व रोनियोंको पचास बेटोंको बीस सहस्र हाथी आदि सर्व सामग्रीको छोड़कर आपके साथ रहूँगा । मुझको तो भक्ति प्यारी लगी है । आपके अमृतवचन सुनकर मेरे सब दोष दूर हो गए । अब कृपा करके अमृतरूप नाम मुझको दीजिये, आपकी भक्ति बड़े भाग्यसे मिलती है, बारम्बार आपसे यह निवेदन है कि, आप मुझको पुरुषका दर्शन कराओ । ज्ञानीजी बोले, हे राजा ! हम तुमको सत्य नाम देंगे । तुमने मुझे पहचाना, इस कारण सत्यपुरुषके नामसे तुम एक यज्ञ करो । (जिस नामसे हंस बचते हैं) । जरीका चंदवा तानो, सुवर्णका सिंह्रासन बनवाओ, सुवर्णमय दीवारगीर तथा मोतियोंकी झालर बनाओ । गजमुक्तासे थाल भरकर धरो, सोनेका कलश धर उसपर पंचमुखी दीपक जलाओ । सरांश यह, सद्गुरुकी आज्ञानुसार राजाने दीक्षा लेनेका समस्त नियम किया । तब सत्यगुरुने राजा रानी इत्यादिको अपने शरणमें लिया, उन सबोंने सत्यगुरुको दण्डवत् करके उनकी स्तुति की । राजाने कहा कि, हे सत्यगुरु ! यहाँ का राजा कालपुरुष है, मैं अब यहाँ नहीं रहना चाहता, अब मेरा यहाँ कुछ काम नहीं है । मुझको अपने लोकमें ले लो, सत्यपुरुषका दर्शन कराओ । राजाकी नौ सौ रानियाँ तथा पचास बेटे सत्यगुरुके सामने हाथ बाँधकर खड़े विनती कर रहे थे । राजाकी एक पुत्री थी, वह भी सत्यगुरुके शरणमें आई सब सत्यगुरुके चरणोंपर गिरकर कहनेलगे कि, हम कदापि आपका शरण न छोड़ेंगे । सत्यगुरुने सब जीवोंको सत्य पुरुषका दर्शन कराया । जितने जीवोंने पान पाया सब सत्य पुरुषके दरबारको चल दिये ।