कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनको स्वसम्बेदकी तालीम (शिक्षा) के सिवाय (अतिरिक्त) और दूसरा कुछ पसन्दीदः नहीं है।
अगर कोई मेरी साबिक (प्रथम) के छापेकी किताब देखकर मुझपर किसी बातका तअनः (तानी) एवाह (अथवा) एतराज (तर्क) करे तो मैं हक्क तआला (सत्य पुरुष-सच्चे मालिक) के हुजूर उसका दामनगीर हूँगा. क्योंकि, मैंने अपनी सारी (कुल-सब) साबिक (पहलेकी) मिहनत और भर (द्रव्य-रुपया) लागत बरबाद करके अज सरैनौ (फिरसे) इसको दुरस्त (सुधार) किया है।
इस दुनियामें चार वेद और चार किताबको तो हर कोई जानता है, लेकिन (किंतु) स्वसम्बेदके बारे (विषय) में कहीं बाजपुरस (पूछताछ) नहीं है, इसलिये चन्द (कई) अशखास (लोग) मुअतरिज हुए (तर्क-किया-पूछा)
और दूसरी बजह यह है कि, जब यह किताब छपी, उस वक्त मुसन्निफ किताब सहीह और दुरस्त करनेकेलिये मौजूद न था; मुसन्निफकी गैरहाजिरीमें किताब छपी, इस सबबसे लोगोंने बेसमझी करके, चंद अलफाज (शब्द) बदल डाले, और मजहबी (साम्प्रदायिक) बातोंमें अलफाजका बदलना बड़ा कुसूर (दोष) है। और मुकाबला करनेवालेकी गफलत (भूल) से गलतियाँ (अशुद्धियाँ) वगैरही भी बहुत रह गयी। इस वास्ते सलाहबक्त (समयोचित) समझकर किताबका रिवाज देना (प्रकाशित) करना मुलतवी रखवा था। अब दूसरी बार इसको फिर तरमीम और तरतीब करके और बहुत मजामीन (विषयों) की ईजादी (वृद्धि) के साथ और खूब हवालेजात (प्रश्न सब) दिये और दुरस्त (सुधार) कर खास शायकीन (अनुरागियों) राह नजात (मोक्ष मार्ग) व मुजमअए खुशखुलक व नेकआदात (सदाचारियों-सुशीलों) व मुनसिफ मिजाज (न्यायी) के वास्ते इस किताबको मरौवज करना और वास्ते फायदा (लाभ) खास लोगोंके कि, जिनका दिल (मन-हृदय-अन्तःकरण) तअमुब (सांप्रदायिक पक्षपात) व तरफदारीसे दूर व तमीज (विवेक) इन-सानी (मानवी) से भरपूर है बाजिब और लाजिम (उचित) जागता हूँ।
सदहा शुक्र सलतनत इंग्लिशियाका है कि, बादशाह और हुक्काम दोनों दुवशा (त्यागी साधुओं) और आजिजों (दीनों) पर ऐसी हमेशा (सदा) हिफाजत (रक्षा) और नजर नबाजिश (दया दृष्टि) की रखते हैं कि, इस