भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बाहर आई, जिससे उसके आभूषण तथा वस्त्रोंकी बड़ी ज्योति फैली । अर्थात् ऐसे ऐसे मणि तथा जवाहरात रानीके मस्तक पर तथा शरीरमें आभूषण थे कि, जिनकी ज्योतिसे मानों सूर्योदय हो आया । तब समस्त दरबारी देखकर आश्चर्यान्वित होकर उठ खड़े हुये । तब रानीने अपनी समस्त दासियोंसहित आकर सत्यगुरुको दण्डवत् प्रणाम किया, हाथबाँधकर सत्यगुरुके सामने खड़ी होकर कहने लगी कि, हम आपके आधीन हैं । राजानेभी बारम्बार दण्डवत् करके सत्यगुरुके चरण पकड़ लिये । जैसे कि, चन्द्र चकोरको देखता है वैसेही राजा सत्यगुरुकी ओर देखने लगा, समस्त दरबारी जो खड़े थे सत्यगुरुकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे कि, आपने बड़ी दया की जो दर्शन दिया । हे दीनदयाल ! आपका चरणरज ऐसा पवित्र है कि, इससे मोहतिमिरका नाश हो जाता है, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य उत्पन्न होकर मोक्ष फल मिलता है । हे साहब ! हम सब आपके गुलाम हैं । हमारे ऊपर ऐसी दया करो कि आपके चरणोंमें प्रीति रहे समस्त आशाएँ छूट जावें । आप ब्रह्मस्वरूप अचिन्त, आदि, अदली, अविगत, अजर, अजीत, अमर अकह और अविचल हो । अक्षय, अखिल, आदि ब्रह्म उद्धारण, अखिलपति अविनाशी पापोंको दूर करनेवाले हो । हंसराज हंसपति और हंस उबारनहार हो आप सर्व सुखके धाम हो । इस प्रकार बहुतेरी प्रशंसा तथा स्तुति करके सत्यगुरु को महलमें लेजाकर सिंहासन पर बैठाया । रानीने चरण धोये (राजाकी आँख से प्रेम के आँसू बह रहे थे ।) रानीने अपने अञ्चलसे चरण पोंछा, सबोंने चरणा-मृत लिया । ज्ञानीजीने सबके शिरपर हाथ रक्खा । राजाको बड़ा ज्ञान प्रगट हुआ. राजा बोला कि, हे साहब ! आपने अपना लिया, अब परवाना दीजिये । जो कुछ आप कहेंगे सो हम करेंगे । ज्ञानीजी बोले कि, हे राजा ! अब तुम सर्व सामग्री मँगवाओ । आज्ञा पातेही यथानियम सब मँगाया, हर्ष और उत्साहके साथ राजा रानी तथा अन्यान्य लोगोंने सत्यगुरुकी दीक्षा ली, सबोंने सत्यगुरुका दण्डवत् प्रणाम किया । सत्यगुरुकी कृपासे सबके शोक सन्ताप छूट गये, कालका जाल दूर होगया तथा उसी समय राजाके बेटे नातियोंसहित अनेकों जीव सत्यगुरु के शरण आये । राजा और रानी सहित सब हाथ जोड़कर खड़े होगये । उस समय राजा कहने लगा कि, हे सत्यगुरु ! आपने मुझपर दया करके वह शब्द बतलाया है जो कि, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवादिको भी दुर्लभ है । मुझे भक्तिदान दिया, अब मुझको अपने लोक लेचलो । सत्यगुरुने कहा कि, हे राजा (अमरसिंह) अभी सवा सौ वर्षका वयस तुम्हारा शेष है, सो तुम सवासौ वर्ष अभी पृथ्वीपर रहो । इसके पीछे मेरे लोकको चलना । राजा बहुत बिनती करने लगा कि, बन्दीछोर ! अब