भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 572

मुझसे यहाँ एक पलभी रहा नहीं जाता, मुझको अपने लोकमें लेचलो । हे सत्य गुरु ! अब आप मेरे पापों पर ध्यान मत दो. हंसोंका टबार करो । इक्कीस लाख जीव आपकी शरणमें हैं, तब ज्ञानीजी बोलें कि, एक नाम है जिसे मैं पुकारके कहता हूँ । हे राजा ! सब हंसोंको साथ लेआओ सुनो, राजा सब हंसोंको ले आया । कबीर साहबने उस नामको पुकार कर सुनाया । उस नामको सुनतेही सबकी देह छूटकर मुक्ति हो गई । उसी समय सब हंसोंने भवसागर छोड़ दिया इक्कीस लाख हंस राजाके साथ लगे, सबके सब सत्यपुरुषके दरबारमें पहुँच आनन्दसे रहने लगे । इस राजाने बड़ी सच्ची भक्ति की, इतने लाख जीव अपने साथ लेकर सत्यलोक को सिधारा, जहाँ जन्म मरणके सब संशय छूट गये, उस देशमें समस्त जीव एक समान हैं, सर्वदाके लिये परमानन्दको प्राप्त हैं वही सत्यपुरुषका देश है । उसके हंस यहाँ ही वसते हैं ।।

सत्ययुग त्रेता और द्वापरके हंस ।

अब हम सत्ययुग और त्रेता द्वापरके हंसोंके विषयमें कुछ कहते हैं । कबीर सागरके दूसरे भाग अनुरागसागरमें यह प्रकरण विस्तारके साथ लिखा है । सत्य-युगमें राजा धोकल और खेमसरी ग्वालिन हुई है, इसमें कबीर साहिब सत्सुकृत कहलाये । त्रेतामें विचित्र भार मन्दोदरी बिचित्र बधू और मधुकर हुए हैं, इसमें कबीर साहिब मुनीन्द्र कहलाते हैं । द्वापरमें रानी इन्द्रमती और सुपच सुदर्शन हुए हैं इसमें कबीर साहिब करुणामय कहाते हैं ।

चारों युगोंमें कबीर साहब एकही प्रकारका उपदेश करते हैं । सहस्रों लोग उपदेश सुनते हुए उसका मान भी कर लेते हैं पर वे सब कबीर साहबके शिष्य इस कारण नहीं कहलाते कि, उनमें अब तक दोष है । अबतक उनको सत्यगुरुका पूरा चिह्न नहीं मिला । हंस कबीरका पूरा पद नहीं प्राप्त हुआ । इस कारण उन लोगोंको आवागमनका । संबंध नहीं छूटा. क्योंकि, जब तक जिन लोगोंके सत्यगुरु का पूरा रंग नहीं चढ़ा तबतक वे सत्यगुरुके हंस नहीं बन सकते । उनकी बुद्धिपर आवरण पड़ा हुआ है । जो लोग सत्यगुरुकी पूर्णरूपसे अनधीनता स्वीकार करते हैं, वही उसके हंस हैं ।

श्वपच सुदर्शन ।

जब द्वापरमें कबीर साहब पृथ्वीपर आये काशी नगरीमें प्रगट हुये, उस नगरके वासियोंको सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश कर रहे थे । उस समय सुदर्शन नाम एक मनुष्य जातिका भङ्गी आकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिरकर निवेदन