भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 573

करने लगा कि, हे सत्यगुरु ! मुझे अपनी भक्तिमें लगाओ । सत्यगुरु उसपर दयालु हुये उसको नाम दिया । जबसे उसने सत्यगुरुका उपदेश पाया तबसे तन मन धनसे भक्ति, साधुसेवा और भजन करने लगा । उसका समस्त विवरण कबीर साहबके ग्रन्थ यज्ञसमाजमें लिखा है । दूसरे स्थानोंमें भी कहीं कहीं लिखा है । जिस समय कबीर साहबने श्वपत्त सुदर्शनका उपदेश दिया, उस समय कौरव तथा पाण्डवोंके बीच बड़ा वैर उपस्थित था । दोनों समरके निमित्त रणभूमिमें एकत्रित हुये थे । दोनों ओरसे सैन्यकी चढ़ाई हुई । बड़ा महाभारत हुआ । इसमें कौरव ससैन्य मारे गये । पाण्डव कृष्णकी सहायतासे विजयी हुये । विजय प्राप्त करनेके पीछे राजा युधिष्ठिर राज्यासन पर बैठे, राजाने एक दिवस एक बड़ाही भयानक स्वप्न देखा । जैसा कि, कबीर साहबके ग्रन्थ उग्रगीतामें लिखा है, इस भयानक स्वप्न को राजाने इस प्रकार देखा कि, समस्त कौरव जो मेरे भाई थे उनका बिना शिरका धड़ रणभूमिमें दौड़ रहा है, वे सब मुझसे अपना बदलालेनेके निमित्त तैयार हैं । राजा युधिष्ठिरने ऐसा भयानक स्वप्न देखा कि उनको बड़ा भय उत्पन्न हुआ, बड़ेही शोकित हुये कि, अब हमको भाई मारनेके महापापसे नरकमें जाना पड़ेगा । इस भयसे कातर होकर युधिष्ठिर श्रीकृष्णके पास जाकर कहने लगे कि, हे महा-राज ! मैंने ऐसा भयानक स्वप्न देखा है जिससे कि, मेरा हृदय स्थिर नहीं है । बड़ा भय उत्पन्न हो रहा है । कृष्ण बोले, हे युधिष्ठिर ! भीमादिको ! सुनो, तुमने अपने भाइयोंकी हत्या की है, जिसका महापाप तुम लोगोंको हुआ है । इतना सुन कर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन बोले कि, हे महाराज ! हम तो महाभारत करनेपर उद्यत नहीं थे । आपनेही गीताका ज्ञान सुनाकर हमें युद्धके निमित्त प्रस्तुत कराके हमारे भाइयोंको हमसे मरवाडाला, इसमें हमारा क्या दोष है ? हम तो आपके आज्ञाकारी थे । श्रीकृष्णने कहा कि वह समय वैसाही था । युधिष्ठिरने कहा कि, हे महाराज ! अब हम क्या करें ? जिससे हमारे पाप छूटे । तब श्रीकृष्ण ने कहा कि, पहले सर्व तीर्थोंका जल मँगवाओ उससे स्नान करो । तब राजाने समस्त तीर्थोंका जल मँगवाकर उससे स्नान किया । श्रीकृष्णने कहा कि, अब तुम हाथी-दान, घोड़ादान, गऊदान, कन्यादान, सुवर्णदान, चाँदीदान, पृथ्वीदान, अन्नदान इत्यादि धर्म करो । तब राजा युधिष्ठिरने समस्त कार्य दान पुण्य इत्यादि वेदकी आज्ञानुसार तथा श्रीकृष्णजीके आदेशानुसार किया । श्रीकृष्णजीने कहा कि, यज्ञ करो, देश देशान्तरोंमें पत्र भेजकर साधुओंको बुलवाकर भोजन कराओ । राजा युधिष्ठिरने ऐसाही किया । सर्वदेशोंसे साधुओंको बुलवाया । समस्त देशों के साधु एकत्रित हुये । श्रीकृष्णजीने एक घण्टा बौधकर लटका दिया कहा कि,

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