भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 574

यह घण्ट जब सात बार आपसे आप बजे तब तुम जानो कि, यज्ञ पूर्ण होगई । राजाने श्रीकृष्णकी आज्ञानुसार सब प्रकारके दान पुण्य करके यज्ञ आरम्भ किया । इस यज्ञमें पच्चीस करोड़ ब्राह्मण आचारी एकत्रित हुये, सात करोड़ अस्सी सहस्र ऋषि, मुनि, सिद्ध साधु (षट् दर्शनके) उपस्थित हुये । पाण्डवोंने बड़े प्रेम तथा भक्ति सहित भोजन करवाया । सब प्रकारके दान पुण्य किये पर एक बारभी घण्ट न बजा । इससे पाण्डवोंके चित्तमें बड़ा सन्देह उत्पन्न हुआ । राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित कृष्णजीके पास जाकर पूछने लगे कि, हे महाराज ! हम लोगोंने तो आपकी आज्ञानुसार सब प्रकारके दान पुण्य किये, बत्तीस करोड़ अस्सी सहस्र साधु ब्राह्मण भोजन कर चुके, सबके ऊपर महाराजा आपने स्वयम् भोजन किया, अब इससे बढ़कर क्या रहा ? पर फिरभी आकाशी घण्ट एक बार भी नहीं बजा । इतनी बात सुनकर भगवान् बोले कि, हमारा सर्व परिश्रम व्यर्थ हुआ, धनका सर्व व्यय निष्फल हुआ, क्या उपाय करे कि, घण्ट बजे ? भगवानने, कहा कि, हे युधिष्ठिर ! तुम ध्यानसे सुनो । जब साधुओंको भोजन करा रहे थे, तब मैं अपनी ज्ञानचक्षुद्वारा उन सबोंको भली भाँति देख रहा था उनमें कोई साधु नहीं दिखाई दिया । उनमें साधु तो जहाँ कोई भी मनुष्य नहीं रहा था, सबके सब ढोंगर ढोर, कीड़े, मकोड़े, पशु, पक्षी इत्यादि बैठे भोजन कर रहे थे । हे युधिष्ठिर ! तुम्हारे यज्ञमें कोई भी साधु नहीं था । कोई सत्यगुरुका अंश तुम्हारे यज्ञमें भोजन करनेके निमित्त नहीं आया था । जबतक सत्यगुरुका अंश न आवे तुम्हारे यज्ञमें भोजन न करे तबतक आकाशी घण्ट नहीं बजेगा, तुम्हारी यज्ञ पूरी नहीं होगी । युधिष्ठिरने कहा कि, हे महाराज ! मैंने देश देशान्तरोंमें पत्र भेजकर, दुँदुवाकर बड़े बड़े सिद्ध साधु बुलवाये । बड़े बड़े तपस्वी आचारीगण आये, इनमें सत्यगुरुका अंश कोई नहीं था क्या ? हे महाराज ! ये सब तपस्वी लोग किसके अंश हैं ? वे सत्यगुरुके अंश किस देशमें रहते हैं ? कौन शास्त्र पढ़ते हैं ? किसकी भक्ति करते हैं ? यहाँ पर कबीर साहब कहते हैं कि, यह सब जो भेष बाना बनाकर रहते हैं, उनमें सहस्रों प्रकारके लोग हैं, उनमें जो मांस मछली इत्यादि खाते, मदिरा पीते, परस्त्रीगमन करते हैं, वे सब चाण्डाल हैं । वे नरकको जावेंगे । भगवा वस्त्र पहनकर स्त्रीगमन करते हैं उनकी ऐसी दशा होवेगी कि—“भगवा बसता बिन्द प्रकासा । सत्तर जन्म श्वान घर वासा ॥” जितने भी षट्दर्शन भेषके लोग एवं सर्व ब्राह्मण आदि हैं उनमें मनुष्यका लेश भी नहीं है । जो सत्यगुरुका अंश है वही मनुष्य है । श्री-कृष्णजी युधिष्ठिरसे कहते हैं कि, हे युधिष्ठिर ! तुम सत्यगुरुका अंश जो श्वपच