भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 577

राज पधारनेसे तुम्हारी यज्ञ पूरी होगी । तुम अपनी दृष्टिसे सुदर्शनजीकी श्रेष्ठता देखोगे तो जानोगे कि, करोड़ों साधुओंमें तथा उनमें क्या विभिन्नता है ? क्या गुण तथा महत्त्व है ? श्रीकृष्णजीकी आज्ञानुसार राजा युधिष्ठिर स्वयम् सुदर्शनजीको बुलाने चले, बनारसमें पहुँच उससे भेंट करके निवेदन किया कि, हे भक्तजी ! आप दया करके मेरे साथ चलो, बिना आपके मेरी यज्ञ पूरी नहीं होती । आप कृष्णचन्द्रके बड़े भक्त हो । महाराज कृष्णचन्द्र आपके हृदयमें विराजमान हैं । भगवान्का मन आपहीसे प्रसन्न है । युधिष्ठिरकी ऐसी नम्रता तथा गिड़गिड़ाहटको देखकर श्वपच सुदर्शनजी दयालु होकर कहने लगे कि, हे युधिष्ठिर ! तुम्हारी नम्रतासे मैं नितान्तही आह्लादित हूँ, तुम्हारे साथ मैं चलूंगा । कारण यह कि, तुम प्रेमी भक्त हो । हे युधिष्ठिर ! तुम निश्चय जानो कि हम कृष्णके भक्त हैं हमारा सत्यगुरु सत्यलोकवासी है । हम उसके अंश हैं — कृष्ण उसीके अवतार हैं । हे युधिष्ठिर ! तुम कृष्णका विश्वास सदा करना क्योंकि, वो भक्तवत्सल है । स्वयम् कृष्ण ने तो तुम्हारे यज्ञमें भोजन किया फिर घंटा क्यों न बजा ? यदि मैं कृष्णका न भक्त होता तो वो मुझको बुलानेकी क्या आवश्यकता समझते, जब स्वयम् श्रीकृष्णके भोजनसे घण्टा नहीं बजा पर कृष्णके भक्तोंके भोजनसे घण्टा बज सकता है । हे युधिष्ठिर ! तुम्हारा प्रेम तथा तुम्हारी भक्ति देखकर मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ, परमार्थके निमित्त मुझको जाना आवश्यक है । यह कहकर सुदर्शनजी युधिष्ठिरके आगे हुये और युधिष्ठिर महाराज उनके पीछे होलिए । इसी प्रकार सुदर्शनको लिये महाराज युधिष्ठिर अपने मकान पर पहुँचे ।

जब श्वपच सुदर्शनजी राजा युधिष्ठिरके मकानमें प्रविष्ट हुये, राजाने रानी द्रौपदीको आज्ञा दी कि, स्वादिष्ट भोजन बनाओ, सन्मान तथा प्रतिष्ठा-पूर्वक सन्तको भोजन कराओ । उसी समय द्रौपदीने भोजन बनानेका प्रबंध किया । भौति भौतिके स्वादिष्ट भोजन बनाकर प्रस्तुत किये । अत्यंत मर्यादाके साथ सुदर्शनजीको आसनासीन कर मेवें तथा पकवानके थाल सामने धर दिये । सुदर्शनजीने जो सम्यक् प्रकारके स्वादोंसे विरक्त थे, सब खट्टा, मीठा आदि भोजन एक साथ मिला दिया । क्योंकि, आपको तो किसी प्रकारके स्वादकी कामनाही नहीं थी । सबको मिलाकर खाने लगे । तीन ग्रास खा चुके थे कि, रानी द्रौपदीके मनमें ऐसा ध्यान हुआ कि, फिर तो सुदर्शन नीच अज्ञानी है, भोजनके स्वादको वह क्या जाने ? मैंने कितनेही प्रकारके भोजन बनाये थे सो सब एकसाथ मिलाकर खाते हैं । नमक मिष्ठान आदिका स्वाद तनिक