भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 576

कहा कि, हे राजाजी ! मैं अपने मकानके भीतरसे हो आता हूँ, तब आपके साथ चलूंगा, तबतक आप मेरी सुमिरिनी लेकर चले। शीघ्रही मैं आकर आपके साथ हो लूंगा। यह कहकर सुदर्शनजी तो भीतर चले गये। भीमसेन उनकी सुमिरिनी उठाने लगे तो न उठी। बड़ा बल लगाया पर उस जगह न छोड़ी; लज्जित होकर भीमसेन उसी जगह खड़े रहे। इतनेमें सुदर्शनजी भीतरसे बाहर आये। देखा कि, भीमजी लज्जित खड़े हैं। तब कहा कि, हे राजाजी ! मैंने आपसे कहा था कि, मेरी सुमिरिनी लेकर आप चलो पर आप खड़े रह गये, क्या कारण है। भीमसेनने उत्तर दिया कि, मुझसे सुमिरिनी नहीं उठी,। सुदर्शनजीने कहा कि, जब मेरी सुमिरिनी आपसे न उठी तो मैं आपके गदा मारनेसे पातालको क्यों कर चला जाता ? आप अब यहाँसे चले जाओ, मैं आपके घर भोजन करने न जाऊँगा। क्योंकि, तुमने भाइयों तथा संबंधियोंको मारकर गिरा दिया, यह महापाप किया है। यह बात सुनकर भीमसेन नितान्तही क्रुद्ध हुए। झुंझलाकर राजा युधिष्ठिरके पास लौट आये। श्वपच सुदर्शनका सर्व हाल कहकर भीमने कहा कि, वह तो बड़ा घमण्डी है। कड़ीबातें कहता हुआ कहता है कि, मैं राजा तथा कञ्जरीके मकानपर भोजन नहीं करता, उसकी सूरत देखनेको मेरा मन नहीं चाहता। हे महाराज ! मैंने आपका तथा श्रीकृष्ण भगवान्का भय किया नहीं तो बिना मारे न रहता। जो कड़ी बातें उसने कही वे मेरे सहन करने योग्य नहीं थीं। इतना सुन महाराज युधिष्ठिर भीम आदिको साथ ले श्रीकृष्णके समीप गये। जाकर कहा कि, हे महाराज ! आपने व्यर्थही ऐसे शूद्रके समीप भेजा। भला इतने सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि, एकत्रित हुए, उनमें सुदर्शन भङ्गीहीको आपने श्रेष्ठ क्यों ठहराया ? उसमें कौनसी बड़ाई है ? वह कैसे सबसे अच्छा है ? श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि, हे युधिष्ठिर ! तुम श्वपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता तथा बड़ाईसे अनभिज्ञ हो; पर मैं भली भाँति जानता हूँ; बिना श्वपच सुदर्शनके भोजन करवाये तुम्हारी यज्ञ पूरी न होगी, न घंटाही बजेगा। भीमसेन बोले कि, हे कृष्णजी ! मैं इस बातका विश्वास न करूँगा, जबतक कि, आँखोंसे न देख लूँ। सात करोड़ अस्सी सहस्र ऋषि मुनियोंमें श्वपच सुदर्शन कैसे श्रेष्ठ ठहरा ? यह बात सुनकर कृष्णजी कहने लगे, हे भीम ! मैं तुम लोगोंको अवश्यही श्वपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता दिखाऊँगा। जब तुम स्वच्छस्नुसे देखलेना तब विश्वास करना। हे युधिष्ठिर ! तुम स्वयम् सुदर्शनजीके बुलानेके निमित्त जाओ। अत्यन्त नम्रता पूर्वक मिलना। बड़ी मर्यादा तथा बड़े सम्मानपूर्वक श्रीमान् महाराज सुदर्शनजीको बुलालाना। सुदर्शनजी महा-