कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 581, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै, हेच' नमक' हुस्नोदमक' हूँ' रो गिलमा' ।
पापोश' चमक' इन्द्रमती हूरके आगे ॥
जेते हैं सलातीन जमी' और 'फलकके !
खिदमंतममें' हैं सारे मेरे फगफूरके आगे ॥
दिलदार है बाजारमें कोपर्दः नशीं' है ।
हाजिर 'बदिले बेदिल 'रञ्जुरके आगे ॥
मूसा 'सदहा गुजरे न देखा कभी सो औज' ॥
गाफिल हुए सब हिसोहवा' ढङ्ग लगाये ॥
कुछ जोर नहीं जालिम' जंवूरके आगे ॥
फिरता बतवाफे तो यह गरदूँ जो कमरकोज ।
सिजदे' झुका है तेरे मनशूरके आगे ॥
कह भेद उसीसे जो कि हो महूरमें' इसरार
कर फाश' न तू हरगिज 'गयूरके आगे ॥
नथुनेमें 'बनी जजान है जबतक तेरे आजिज ॥
कर उसकी बुजर्गी खडे जम्हूरके आगे ।
यथा ।
भारतो 'स्वसमवेदकी तहरीर' में देखो ।
उलमाय' फकीरनकी' तकरीर' में देखो ॥
जिनके सदहा लख हैं सुदर्शनसे गुलामों ।
सो साहब के कलमए 'तासीर में देखो ॥
मखलूक' जहाँ मजमअ' हुआ केते करोडों ।
इस सत्यगुरु की 'खादिम तौकरिमें' देखो ॥
बन्दे हैं पडे कैद हसीनान' हजारो ।
बबदल' बुते जुल्फकी' जञ्जीर में देखो ॥
जिस नामसे वाकिफ' न जमी' और न जमाँ' है ।
सो नाम है उस खादिमे जागीर में देखो ॥
१ तुच्छ, २ खार, ३ सौन्दर्य, लावण्य, ४ परी, ५ सुंदर सुंदर लडके, ६ जूती, ७ लावण्य,
८ भू, ९ आसमान, १० सेवा, ११ पदमें छिप हुआ, १२ हृदयके व्याकुल, १३ अत्यन्त रंजीदा,
१४ रातदिन, १५ तपिश, १६ जिस पर्वतपर मूसाको परमात्माके दर्शन हुए थे, १७ अत्यन्त-
जुल्मी, १८ वन्दना, १९ ढकना, २० जाहिर, २१ गमार, २२ कविकी कविताका नाम है ।
२३ आत्म बोधक शास्त्र या कबीर साहबका बीजक, २४ लिखावट, २५ उलमा, २६ फकीरों
२७ वचन, २८ स्वभाव, २९ पैदा, किया, ३० समूह, ३१ खिदमत करनेवाला, ३२ सत्कार ।
३३ प्रसन्न चेता, ३४ न फिरनेवाले, ३५ शरीर, ३६ जानकर, ३७ भू, ३८ जमाना,