कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतो फिर यह फकीर दरबारे इजहार उन अकबालके पुरे तकसीर क्यों तसन्वर जिया जावे । इस वास्ते वाहि्यात इतराजोंसे यह मुआफ फरमाया जावे ।
वह कबीर सारे जहानका गुरु पीर अपनी बुजुर्गी और जलाल खु आप जाहिर करता है और जब चाहता है छुपा लेता है, यह इनसान जई फूल व्यान क्या लिखे और क्या कहे, फिरिश्तोंमें भी किसीको यह कुदरत नहीं कि, उसकी उलूहियत और रबूबियतमें दम मारके, उसके जलाल बेमिसाल कुल आलममें नशर और बाहर बयाने वशर है ।
इस दुनियाके आदमजाद बेखबर हैं कि, ब्रह्म क्या है, जीव क्या और माया क्या है ? खुदा क्या और बंदा क्या है ? खुदा परस्ती क्या और बुत परस्ती क्या ? सो सब इस किताबमें खोल खोल कर दिखला दिया है और खूब साबित कर दिया है कि, कुल आलम मायापरस्त है और जो माया परस्त है वही बुतपरस्त है । खुदापरस्तीकी खबर उसीको होती है जिसको सतगुरु कबीर साहब बतलाता और सिखलाता है और जो कोई खुदा परस्तीको जानता है वह तोहमातसे अलग होता है । खुदा परस्त हवस हैवानी और तनासुखसे बिलकुल मुबर्रा होता है ।
राकिम खाकसार—
साधु परमानन्द, मुसद्दिक.
इस प्रकारसे कबीरमन्शूरके आदि अन्तमें लिखा है ।
पाठकोंको यह जानना चाहिये कि, स्वामी परमानन्दजीने बारम्बार अपने ग्रन्थोंमें लिखा है कि, साम्प्रदायिक ग्रन्थोंमें सांकेतिक शब्दोंको बदलना या ग्रंथ-कर्ताके विरुद्ध उसमें सुधार करना पाप है । “जो कोई मेरे इस ग्रंथमें रद्दबदल करेगा तो मालिकके दरबारमें मैं उसका दामनगीर हूँगा । फिर ऐसी दशामें जब कि, ग्रंथकर्ता स्वतः अपने भले या बुरे लिखे हुएको पूरा पूरा ज्योंका त्यों रखवाया चाहता है, तो अनुवादकको कोई अधिकार नहीं है कि, इसमें कमी बेसी या रद्द बदल करे हों आवश्यकता पड़नेपर परस्तावना या स्थान स्थान २ की टिप्पणियों अपनी समझ बूझके अनुसार भाव अवश्य प्रकट किये जा सकते हैं, सो संतगुरुकी कृपासे शक्तिभर किया जायगा ।
इतने शब्द लिखनेकी आवश्यकता क्यों पड़ी ? इसका कारण परस्तावनामे देखनेसे ज्ञात होगा ।
सर्व संतमहंतोंका कृपाकांक्षी —
कबीराश्रमाचार्य
श्रीयुगलानन्द बिहारी,
अनुवादक.