कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ कबीरमन्शूर प्रारम्भ
मंगलां चरण
धन सतगुरु सतपुरुषतू, सत्यनाम इस्थीर ।
सतसुकृत मुनीन्द्र तुही, करुणा पूर्ण कबीर ॥ १ ॥
तेरे गुण गावत सदा, सिद्ध साधु मति धीर ।
हंस परमहंस सब गावहीं सत्य धाम सुखथीर ॥ २ ॥
तेरिहि कृपा कटाक्षते, कटे काल जंजाल ।
बार बार तोहि नमन है, होहु कृपालु दयाल ॥ ३ ॥
हौ अज्ञान जानू नहीं, तेरे गुण की गाथ ।
तुहि सतगुरु कृपाकरी, मोहि लखाऊ पाथ ॥ ४ ॥
विनु दया सतगुरु तेरी, नाहि मोर निरवाह ।
अपनी और निहारहू, लगे सु भवको थाह ॥ ५ ॥
माथ नवा तू लेखनी, लिख सतगुरु गुणगाथ ।
पूरन पुरुष कबीर है, सब नाथनको नाथ ॥ ६ ॥
विनु पारख नहिं पाइये, सब देवनको देव ।
कृपा करे सतगुरु सही, सहजे पावे भेव ॥ ७ ॥
जापर कृपा सतगुरुकी होई । पूरन पुरुषको जाने सोई ॥
पूरन पुरुष सु आपु कबीरा । करि कृपा मेटे सब पीरा ॥ १ ॥
सब महुँ पूरण अदली आपा । करि अदल मेटै सब तापा ॥
काल गवको तोडनहारा । टूटे दिलको जोडनहारा ॥ २ ॥