भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 63

जाके दर पर माथ नवावें । सिद्ध औलिया भूप सब जावें ॥
आपे पुरुष सो आप कबीरा । अगम्य अपार गहिर गंभीरा ॥ ३ ॥
एकै पुरुष रूप दोउ आही । उहवों पुरुष कबीर जग माहीं ॥
सत्यपुरुष आज्ञा अस होई । जाहु कबीर जग पहुँचो सोई ॥ ४ ॥
काल निरंजन ठाठ बहु ठाटे । जगत जीव न पावैं वाटे ।
भूले जीव भून वह खावे । लाख जीव नित प्रति सतावे ॥ ५ ॥
ऐसा जाल निरंजन लाया । एको जीव न मो पुर आया ॥
अब ज्ञानी जाओ संसारा । सुकृत जीवन करो उबारा ॥ ६ ॥
अस पुरुष जब आज्ञा दीन्हा । तब ज्ञानी रख पृथ्वी कीन्हा ॥
सोई सतगुरु सत्यकबीरा । आज्ञा पाइ आये भव तीरा ॥ ७ ॥
सोई ज्ञानी पुरुष है, सतगुरु सत्यकबीर ॥
रज वीरज ते पैदा नहीं, स्वाँसा नहीं शरीर ॥

कर्म जाल काटे गुरु देवा । आप न बन्धे करमके भेवा ॥
ज्ञान ज्योति वह अपहि आपा । गुरु सरूप सबघट महँ व्यापा ॥ १ ॥
करि पारख जोइ कोइ जाने । अलख ज्योति वह परत पिछाने ॥
गुप्त रूप वह जगमें डोले । शब्द रूप वह घट घटबोले ॥ २ ॥
बिना काम वह रूप अनूपा । सम दृष्टि वह रंक औ भूपा ॥
काल अग्नि महँ सबको दाहे । विनु सतगुरु नहि होय निवाहे ॥ ३ ॥
देह विदेह वह आप सरूपा । जीव हेत धर देह अनूपा ॥
हंस होय सोई पाह्वाने । अगम अगोचर किहिं विधिजाने ॥ ४ ॥
जब जाने तब उघरे भागा । दोऊ लोक महँ परम सुभागा ॥
जेते इष्ट जगत महँ जानो । सब कर इष्ट ताहि पहिचानो ॥ ५ ॥
अहे विनह देह दिखलावे । विनु दया न पार कोई पावे ॥
बड अचरजको करै बखाना । किहिं विर्वाध जाने जीव जहाना ॥ ६ ॥
आवत सरधा गुरु जगावे । बाहर भीतर एक दिखावे ॥
देखतबुद्धि थकित ह्वै तबहीं । दरशे रूप पुरुषकर जबहीं ॥ ७ ॥
भवभय भंजन दुखहरन, अम्मर करन शरीर ।
आदि युगादी आप है, अदली अदल कबीर ॥
सत्यपुरुष औ सत्य कबीरा । दुई रूप दरसाये मतिधीरा ॥
इष्टरूप सतपुरुषहि जाना । गुरु रूप सति कबीर पिछाना ॥ १ ॥