कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकै रूप दरसै दुई भावा । जीव उबारन युक्ति बनावा ॥
ऐसी युक्ति न कबीर बनावत । नगत जीव न मारग पावत ॥ २ ॥
किहि विधि कहूँ कहा नहि जाई । आपे पुरुष सब माँहि रहाई ॥
घट घट महँ आप विराजे । आपे ब्रह्म जगत हँ छाजे ॥ ३ ॥
आपे आत्म परमात्म रूपा । जीव शीव सब आप अनपा ॥
द्वैत भाव न दरसे कोई । आपे पुरुष कबीर है सौई ॥ ४ ॥
आपे गुरु शिष्य पुनि आपै । एकै भाव जाप हुई जापै ॥
सिद्ध साधु औलिया जेते । बिन जाने जग भटकै तेते ॥ ५ ॥
करि कृपा जब आप लखावे । दे पारख जग भरम मिटावे ॥
काल जाल तबहीं टल जाई । निकटहि पावे पुरुष गुसाई ॥ ६ ॥
सत्य सत्य में कहूँ पुकारा । परमानंद अस वचन उचारा ॥
युगल आनन्द पाया तबहीं । उर्दू ते हिन्दी किया जबहीं ॥ ७ ॥
कबीर मन्शूर ग्रन्थको, आदि अरम्भन कौन ।
परमानन्द स्वामी रचे, उर्दू माहिं परवीन ॥
ताकी हिन्दी में करूँ, संत महंत आदेश ।
जो उर्दू जानत नहीं, पढि गुनि भिटै क्लेश ॥
उसी मङ्गला चरणका अनुवाद दूसरे छन्द में
कर वन्दना सद्गुरु चरण को आज ऐ तू लेखनी ? ।
लिखनी उन्ही की है कथा यह बात इतनी देखनी ॥
व्यापक सभीमें एकसा वह न्यायकारी पूर्ण है ।
अभिमानियोंका मान करता शीघ्र क्षणमें चूर्ण है ॥
सादृश्यता उसकी नहीं कोई कहीं भी कर सके ।
याचकोंकी पूर्ण इच्छा कौन दूजा कर सके ? ॥
दीनसे सम्राट तक तेरे हि भिक्षुक हैं सभी ।
तेरी दया बिन ज्ञानको कोई न पायेगा कभी ॥
आज्ञा पुरुषकी पायके सतलोकसे तुम आगये ।
आनन्द दायक मोद फिर सबके हृदय बिच छागये ॥
पापियोंके पारका बीड़ा उठाया आपने ।
सतलोकमें पहुँचा दिया फिर ज्ञान देकर आपने ॥
लक्ष जीवोंको जहाँपर काल खाता भूनकर ।
नित्य लीला थी यही जन सत्य पथका खूनकर ॥
उद्धार आपने उनका आकर किया है लोकमें ।
उनको बचाया शीघ्र ही जो थे बडेही शोकमें ॥