भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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एकै रूप दरसै दुई भावा । जीव उबारन युक्ति बनावा ॥
ऐसी युक्ति न कबीर बनावत । नगत जीव न मारग पावत ॥ २ ॥
किहि विधि कहूँ कहा नहि जाई । आपे पुरुष सब माँहि रहाई ॥
घट घट महँ आप विराजे । आपे ब्रह्म जगत हँ छाजे ॥ ३ ॥
आपे आत्म परमात्म रूपा । जीव शीव सब आप अनपा ॥
द्वैत भाव न दरसे कोई । आपे पुरुष कबीर है सौई ॥ ४ ॥
आपे गुरु शिष्य पुनि आपै । एकै भाव जाप हुई जापै ॥
सिद्ध साधु औलिया जेते । बिन जाने जग भटकै तेते ॥ ५ ॥
करि कृपा जब आप लखावे । दे पारख जग भरम मिटावे ॥
काल जाल तबहीं टल जाई । निकटहि पावे पुरुष गुसाई ॥ ६ ॥
सत्य सत्य में कहूँ पुकारा । परमानंद अस वचन उचारा ॥
युगल आनन्द पाया तबहीं । उर्दू ते हिन्दी किया जबहीं ॥ ७ ॥

कबीर मन्शूर ग्रन्थको, आदि अरम्भन कौन ।

परमानन्द स्वामी रचे, उर्दू माहिं परवीन ॥

ताकी हिन्दी में करूँ, संत महंत आदेश ।

जो उर्दू जानत नहीं, पढि गुनि भिटै क्लेश ॥

उसी मङ्गला चरणका अनुवाद दूसरे छन्द में

कर वन्दना सद्गुरु चरण को आज ऐ तू लेखनी ? ।

लिखनी उन्ही की है कथा यह बात इतनी देखनी ॥

व्यापक सभीमें एकसा वह न्यायकारी पूर्ण है ।

अभिमानियोंका मान करता शीघ्र क्षणमें चूर्ण है ॥

सादृश्यता उसकी नहीं कोई कहीं भी कर सके ।

याचकोंकी पूर्ण इच्छा कौन दूजा कर सके ? ॥

दीनसे सम्राट तक तेरे हि भिक्षुक हैं सभी ।

तेरी दया बिन ज्ञानको कोई न पायेगा कभी ॥

आज्ञा पुरुषकी पायके सतलोकसे तुम आगये ।

आनन्द दायक मोद फिर सबके हृदय बिच छागये ॥

पापियोंके पारका बीड़ा उठाया आपने ।

सतलोकमें पहुँचा दिया फिर ज्ञान देकर आपने ॥

लक्ष जीवोंको जहाँपर काल खाता भूनकर ।

नित्य लीला थी यही जन सत्य पथका खूनकर ॥

उद्धार आपने उनका आकर किया है लोकमें ।

उनको बचाया शीघ्र ही जो थे बडेही शोकमें ॥