भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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वह आपही कब्बीर हैं गुरु श्रेष्ठ सबसे ठीकही ।
उपदेश है प्रभु आपका पाषाण दृढ़ता लीकही ॥
माता पिता बिन जगतमें स्वयमेव आये आप हैं ।
ज्योती अलखसे हो प्रगट सबके मिटाये ताप हैं ॥
देही नहीं पर देह धारण की जगतमें आपने ।
दाय़ा दिखाई लोकमें कैसी जनोपर आपने ॥
आपके स्वसम्बेदका कुछ ज्ञान जिसने पालिया ।
त्रयलोककी सम्पत्ति सकल मानो उसीने पालिया ॥
पहचान जिसने आपकी शुभ ज्ञान पूर्वक कर लिया ।
शक्तिका भण्डार मानों पूर्ण दिलमें भरलिया ॥
सब दुःख दारुण शीघ्रही उसके हृदयसे छट गये ।
विज्ञानके गुरु श्रोतसे मानों सुधासे पट गये ॥
तर्कयुत सन्देह जब छाने लगे बहुजगतमें ।
सत् ज्ञानकी ज्योती जगाई पूर्ण अपने भक्तमें ॥
दाय़ा अलौकिक जो दिखाई आपने निज दास पर ।
बाहर व भीतर आपही भरपूर देखा आस धर ॥
गर न देते ज्ञान यह अज्ञान तम छाता बड़ा ।
मुक्ति पाता जीव नहीं यम जाल पासामें जड़ा ॥
माता पिता प्रभु आप हैं अरु ताप नाशक आप हैं ।
प्रत्येक जनमें बस रहे हरते विकट सन्ताप हैं ॥
सत्पुरुष ही प्रभु आप हैं यह ज्ञान योगी जानते ।
संत जन श्रद्धा सहित इसको सदाही मानते ॥
सिद्धि साधक और जितना साधुवृन्द महान है ।
केवल कृपापर आपकी गौरव सभीका मान है ॥
महिमा प्रभो हे ! आपकी मैं कौन वरणन कर सकूं ।
अति तुच्छ सेवक हूँ महा सब ज्ञान कैसे कर सकूं ॥
शक्ति मनुजमें है कहाँ गुणगान प्रभु तब कर सकें ।
महिमा अमित अगाध है तब पार क्योंकर कर सके ॥
केवल हमारी प्रेमयुत स्वीकार करिये वन्दना ।
अरु काटिये जंजालमय यह दीर्घ यमकी फन्दना ॥

अनुवादक—

साहित्यालङ्कार हंसदास शास्त्री
(सम्पादक कबीरचन्द्रोदय)