भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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प्रथम आवृत्तिका मङ्गलाचरण

अनन्त धन्यवाद है उस महान् परमात्माको, जिसके गुणोंकी परमहंस गाकर, अपना कार्य सुधारते और मोक्षपदको प्राप्त करते हैं। उसकी दया अनन्त है, समस्त स्तुति और प्रार्थनाएँ उसीके निमित्त हैं।

शेर

नवा सीस अपना तु ऐ लेखनी । कि गुण तुझसे लिखने हैं जगदीश्वरी ॥
जो पूरनपुरुष सब जगह वरतमान । हृदयमें उन्हींका कराना है ज्ञान ॥
दया करके देगा जिसे वह समझ । तोफिर हरमेंहर उसको लेगानिरख ॥
कहीं भी कोई तेरा जोडा नहीं । तेरे न्यायसे है भरी सब जमीं ॥
घमंडीका तू दर्प करता है चूर्ण । हृदय भग्नकी आहत करता है पूर्ण ॥
तेरे द्वारके हैं भिखारी सभी । शाहंशाह राजा गदाओ वली ॥
पुरुषने कहा जाओ जगमें कवीर । मेरी आज्ञा लेके तुम ए गँभीर ॥
मेरे लोक पापी है आया नहीं । जहाँमें कोई मुक्ति पाया नहीं ॥
पुरुषकाल खाता उन्हें भूनकर । वह हर रोज लख जीवका खूनकर ॥
बचा लीजिए जो है शुद्धात्मा । जो स्वीकार करले मेरी आज्ञा ॥
वो है आदमी सारे गुरुका वपीर । जिसे कहते हैं सत्यसाहब कबीर ॥
न उसकी है माता है न कोई पिता । अलख ज्योतिसे है वह पैदा हुवा ॥
यहाँ आके उपदेश उसने किया । भटकतोंको राह उसने बतला दिया ॥
चले जाते थे जीव जो आगरपर । बचाया उन्हें आपने आनकर ॥
दया आगई लोगोंके शोकसे । चले आपले हुकम सतलोकसे ॥
सकल सृष्टिका है वही स्वामि एक । यही माने सब छोड़ कर अपनी टेक ॥
नहीं देह पर देह परगट हुआ । जो ज्ञानी हैं वे मनमेंले यह जमा ॥
उसे जानते दूर हो दुःख दंड । प्रशंसामें उसके जबों सबकी बंद ॥
कोई आदमी जो बड़ा बुद्धिमान । बढा करके बुद्धी लिया उसको जान ॥
नहीं देह पर देह जिसकी प्रकट । तअज्जुबकी बातें करूँ निष्कपट ॥
जब इस ध्यानमें गोता खाने लगा । दयालू गुरु तब जगाने लगा ॥
जो देखा तो बाहर व भीतर वही । सबी वस्तुमें है वही आपही ॥
मिहरबाँ दो सूरतको दिखलाया यों । गुरुहो मनुष्योंको सिखलाया यों ॥

१ यह अनुवाद मूलका ठीक नहीं है क्योंकि मूलमें लिखा है 'जो आबे नजर इल्म की दूरबी' इसका अर्थ है जो ज्ञानकी दृष्टिसे देखा जाता है। इसी प्रकार पहले अनुवादमें मूलके विरुद्ध अगणित अशुद्धियाँ हैं।