कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंअगर वह दो सूरत दिखाता नहीं । तो इनसान घर अपना पाता नहीं ॥
न हरगिज कोई छूटता कालसे । न वे उसके बचता था जंजालसे ॥
यह क्यों कर कहूँ तुमसे मैं माजरा । स्वयं सत्पुरुष आदमीमें बसा ॥
जहाँ देखो वह आपही आप है । वही सबकी माता वही बाप है ॥
स्वयम् सत्पुरुष बना है कबीर । जिसे जानते सब हैं शाही फ़कीर ॥
जती सिद्ध साधु औलिया बह गये । जिसे उसने रक्खा सोई रह गये ॥
प्रथम भाग
पहिला अध्याय
प्रथम प्रकरण
सत्पुरुषका वर्णन
सत्पुरुष यथार्थ जगत कर्ता है, वह पवित्र है—वह न कभी गर्भमें आता है न रज वीर्यसे उत्पन्न होता है । वह विषयवासनासे रहित एकरस और पूर्ण है, सब संसार उसीसे प्रकट होता और उसीके आश्रय स्थित रहता है, वही यथार्थमें सबका कर्ता धर्ता है। उसका किसीसे राग और द्वेष नहीं है, वह पूर्ण और निर्विकार है—उसीका गुणानुवाद सब योगी यती करते हैं तथा उसीके निमित्त कुल स्तुति तथा प्रशंसाएँ हैं, उसका पूर्ण वर्णन कोई कर नहीं सकता, उसकी अनुग्रह बिना किसीकी मुक्ति नहीं होती, वह सर्वशक्तिमान् है। यदि उसकी इच्छा हो तो समस्त संसारकी एक पलमें मुक्ति कर दे, वेदकी तो सामर्थ ही क्या है स्वसंबेद भी उसका गुण गाते गाते मौनावलम्बी हो जाता है और कहता है, कि उसमें यह बल नहीं कि, वह उसका वर्णन कर सके और जिन मुनियोंने उसे पहचाना उनका भी यही कथन है कि, किसी ऋषि, मुनि और सिद्ध साधु इत्यादिमें इतनी योग्यता नहीं है कि, वह उसकी व्याख्या कर सके। इस प्रकार जब समस्त वेद और मुनियोंकी जिह्वा उसकी प्रशंसामें बंद है तब ऐसी अवस्थामें मुझ अल्पबुद्धि, अल्पज्ञ, तुच्छ मनुष्यकी क्या सामर्थ्य है कि, उसका गुण गा सके, मैं इतनाही कहना उचित समझता हूँ कि, हे प्रभु ! तेरी महिमा तूही जान सकता है, मुझ दोषी पापी विचारे पर दया कर ।