भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 620

कहा, तब सद्गुरुके चरणोंपर पड़कर विनय करने लगा कि, हे प्रभु ! मुझे यहाँ ही रहने दीजिये । तब सद्गुरुने समझाया कि, जब तुम्हारी आयु पूरी हो जावेगी तब यहाँ आकर वास करना । पृथ्वी पर आकर राजाने सद्गुरुसे कहा, हे बन्दी छोर ! अब तक मैं यही जानता था कि, जैसे और सब साधु हैं वैसे आपभी हो परन्तु अब जान लिया कि, आप साक्षात् सत्यपुरुष सर्वशक्तिमान् निर्वाण स्वरूप हो, हे स्वामिन् ! जिस प्रकार मेरे ऊपर कृपा की उसी प्रकार मेरे पुरुषोंको, जो अनेक प्रकारके पाप कर्मोंको करते हुए मृत्युको प्राप्त हुए हैं उन पर भी करिये । सद्गुरुने दया करके राजा सहित अनेक जीवोंका उद्धार किया, यह काल्पनिक नहीं किन्तु ऐतिहासिक बात है ।

नौबाब बिजलीखाँ ।

नौबाब बिजलीखाँबोध नामक ग्रंथ तो मेरे पास नहीं पहुँचा परन्तु यह महाशय कबीर साहबके सुप्रसिद्ध शिष्योंमें एक हैं ये राजा बड़े प्रेमी भक्त और सत्यगुरुसे बड़ा अनुराग रखते थे । मैंने सुना है कि, कबीरसाहबके समयके लिखे हुये ग्रंथ अबतक उनके घरमें पाये जाते हैं । बिजलीखाँके घरानेके लोग सत्यगुरु की भक्ति करते हैं । जहाँ कबीर साहबकी समाधि बनी है वहाँ एक ओर हिन्दू और दूसरी ओर जो मुसलमान शिष्य बिजलीखाँके घरानेके लोग हैं ! दोनों सत्यगुरुका गुण गाते हैं । इसके अतिरिक्त उस देशमें सहृदयः मुसलमान कबीर साहबके भक्त हैं, जो मद मांस आदि निषिद्ध कर्मोंसे सदाही वर्जित हैं, हिन्दू-वैष्णवोंके समान आचार व्यवहार रखते हैं साधुओंसे परम प्रीति करते हैं । गुरु साहबकी बाणीपर पूरी श्रद्धा रखके बड़े प्रेमके साथ नित्य नियमसे पाठ करते हैं । कबीर पन्थके इतिहासमें उनका नाम बड़े आदरके साथ लिया जायगा । कबीर साहिबने इसीके राज्यमें शरीर छोड़ा है, वहाँ बीरसिंह इनकी दो दो चोंचें भी हो गई हैं ।

रविदास ।

जिस समय रविदासजीने कबीर साहिबसे बाद विवाद किया उस समय रविदासजीने अपने मनमें सोचा और समझा कि, मैं जिनको मानता हूँ जिन पर भरोसा रखता हूँ वह तो उस योग्य नहीं हैं । मैं भ्रमसे उसे मानता था । वह सब तो स्वयम् बंध और विवश हैं, मुझको क्या बचा सकते हैं । वाद विवादके अन्तमें रविदासजी कबीर साहबके चरणोंपर गिर कर शिष्य हो गये । इसी प्रकार सहस्रों जब अपनी अपनी मूर्खता तथा अज्ञानतासे विज्ञ हुए भली भाँति समझ लिया तब उनके मनका भ्रम टूट गया उन्होंने कबीर साहबकी शरण ली । यह