कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 621, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबात केवल यह तुच्छ वास तथा अन्यान्य कबीर पन्थी ही नहीं कहते वरन् अन्यान्य जातिके लोग भी लिखते चले आ रहे हैं । देखो किताब "तजकिरा गौसिया २५६ पृष्ठमें" रविदासजीके कबीर साहबका शिष्य होनेका हाल लिखा हुआ है, कितने मुसलमानी धर्मके प्रतिष्ठित महात्मा कबीर साहबकी श्रेष्ठता प्रगट करते आते हैं ।
हस्तावलम्बिनी कञ्जरी ।
कबीर कसोटीमें लिखा हुआ है कि, जब साहबके माहात्म्यकी प्रसिद्धि देश देशमें हुई, लाखों सेवक और शिष्य होगये । पन्थ भली भांति पृथिवीपर प्रचलित हुआ, समीपमें बड़ी भीड़ रहने लगी, उस समय साहबने एक ऐसा अनुपम कौतुक किया कि जिसके देखने तथा सुननेसे समस्त काशी नगरीमें हँसी हुई और प्रशंसाके स्थान आपकी निन्दा होने लगी ।
उपरोक्त घटना सम्बत् १६४५ विक्रमी फाल्गुन सुदी पूर्णिमासीमें है, होलीका दिवस था । उस दिवस कबीर साहब एक बगलमें कञ्जरी, दूसरीमें रविदास भगतको लेकर अपने हाथमें गङ्गाजल भरी हुई बोटल लिये हुए बाजार में से चले । यह कौतुक देखकर बनारसमें बड़ा ठठठा पड़ा, अच्छी धूल उड़ी । चारोंओरसे कबीर साहबकी हँसी मसखरी होने लगी । अब प्रथम उस कञ्जरीका वृत्तान्त सुनो । पूर्वकालमें सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि इत्यादि सभी भक्तोंकी भूमि पर भजन किया करते थे । कारण यह कि, भक्तोंका ऋषीश्वरोंकी तपस्याकी जगह बहुत दिनोंसे चली आई है । एक समय ऋषीश्वर भजन कर रहे थे उसी समय एक बरवर्णिनी अप्सरा आकाशसे उतरी, उसने चाहा कि, मैं इन ऋषीश्वरोंकी परीक्षा करूँ कि, इनको काम सताता है अथवा नहीं ? वह भड़कीले वस्त्र पहनकर लटकती मटकती तपस्वियोंके निकट गई । उन लोगोंने अपने तपके प्रभावसे जान लिया कि, यह दुष्टा हमारी तपस्या नष्ट करने आई है । तब उन लोगोंने उसको शाप दिया कि, तू कञ्जरी हो जा । कारण यह कि, तू हमारा धर्म बिगाड़नेको आई थी । यह शाप सुनकर वह अप्सरा डाढ़ें मारमारकर विलाप करने लगी । उसका हृदयवेधक रोना सुनकर परम दयालु दीनबंधु सद्गुरु कबीर साहब प्रगट हो गये, उससे कहा कि, तू मत रो धैर्य धर, मैं तेरी मुक्ति करूँगा ऋषीश्वरोंका वचन तो सत्य होगा परन्तु तू काशीमें (मेरे समयमें) कञ्जरी होवेगी । यह वही अप्सरा थी जो काशीमें कञ्जरी हुई । इसको साथ लेकर कबीर साहब काशीके बाजारोंमें घूमे तब बनारसके लोग ठठठा करने और ताली बजाने लगे । संन्यासियों तथा ब्राह्मणोंका भली प्रकार दौव घात लगा । बड़ा उपहास तथा निन्दा