भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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करने लगे। जो बड़े बड़े अच्छे वणव सन्त थे वे शिर झुकाकर यही करते कि, ऐसे महात्माका चरित्र समझमें नहीं आता, कितने कुछ और कितने कुछ कहते थे। इसी अवस्थामें कबीर साहब काशिराजके दरबारमें गये, राजाने देखकर सिर नीचा कर लिया। कबीर साहबकी यह अवस्था देखकर बहुतसे शिष्योंका विश्वास ढीला हो गया। ब्राह्मण तथा संन्यासी तालियाँ बजाते हुए कहते थे कि, देखो चार दिनोंके वास्ते कबीर भी भक्त बन बैठे था अब अच्छी कलई खुलगई। कबीर साहब राजा बनारसके सामने इसी स्वरूपमें गये, राजाको शिर झुकाये देखा कि, झट उस बोटलका जल अपने पैर पर ढरका दिया। यह बात देखकर राजाको भय हुआ कि, कहीं साहबने रुष्ट होकर यह जल अपने पैरोंपर तो न ढरकाया हो, राजाने पूछा कि, महाराज? इसका क्या कारण है कि आपने यह जल डाला। रविदासजीने उत्तर दिया कि, जगन्नाथपुरीमें अटकाटूटकर पण्डेके पगोंपर गिर पड़ा, उसका पाँव बहुत जल गया है, इस जलसे कबीर साहबने आरोग्य किया है। उसके पाँव पर यह जल डाल दिया इसके पड़तेही वह अच्छा हो गया है। यह बात सुनकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ कि, जगन्नाथपुरी तो काशीसे बड़े अन्तर पर है, वहाँ पहुँच कर कबीर साहबने पण्डेका पैर कैसे चढ़ा किया। उसी समय राजाने दिन तारीख और समय लिख लिया। अपना सौड़नी सवार जगन्नाथपुरी को भेजा कि वह जाकर ठीक २ समाचार लावे। उस समय शाहसिकन्दर लोदी भी काशीमें उपस्थित था, उसनेभी अपने शीघ्रगामी सौड़नी सवारको यह वृत्तान्त जाननेके निमित्त भेजा जिसमें इस बातका भली प्रकार निश्चय हो। दोनों अधीश्वरोंके सौड़नी सवार जगदीशपुरीमें जा पहुँचे, वे उस पण्डेके पास जिसका पाँव जला था गये तो देखा कि, वहाँ कबीर साहब बैठे हैं। सवारोंने कबीर साहब को नमस्कार किया पण्डेसे सब वृत्तान्त पूछा कि, कैसे तुम्हारा पाँव जला एवं किस प्रकार अच्छा हो गया? पण्डेने बताया कि, मैं ठाकुरको भोग लगानेके लिये अटके प्रस्तुत करता था, वह फूटकर मेरे पैर पर पड़ा, मैं जलने लगा, महाराज कबीर साहबने मेरे पाँवपर जल डाल दिया। उस समय मैं चढ़ा हो गया। यह बात सुन पण्डेसे पत्र लिखवाकर दोनों सवार बनारसमें पहुँचे। राजा वीरसिंह तथा शाह शिकन्दरके हाथोंमें दोनोंने पंडेका पत्र दिया, उन्होंने पढ़ा। सवारोंने प्रगट किया कि कबीर साहब तो जैसे यहाँ थे वैसेही पुरुषोत्तमपुरीमें उपस्थित हैं, उनका भेद कुछ जाना नहीं जाता? यह बात जानकर राजा तथा बादशाह दोनोंको विश्वास हो गया। राजा वीरसिंहके मनमें बड़ा भय उत्पन्न हुआ कि, मुझसे महाराजकी अप्रतिष्ठा हुई। अब मैं क्या करूँ किस प्रकार अपना दोष क्षमा