कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 623, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकराऊँ । सत्यगुरु तो सर्व त्यागी हैं मुवर्ण तथा चाँदी आदिसे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, न किसी वस्तुकी उनको इच्छा है ? तब राजा और रानी दोनों नङ्गे पाव होकर घासका पोला अपने सिरपर धरकर एक अगौछी अपने २ गलमें डाल, आकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिर हाथ बांधकर निवेदन करने लगे कि, आप मेरे अपराधको क्षमा करो । कबीर साहबने राजा रानीका बड़ा भारी सम्मान करके कहा कि, हे राजा ! साधुओंके खेल तथा कौतुक जाने नहीं जा सकते, सांसारिक के विचारमें आ नहीं सकते । आप अत्यन्त नम्रतापूर्वक साधु तथा गुरुकी सेवा किया करो । यह कलिकाल महा कठिन समय है, इसमें लोग साधु तथा गुरुकी सेवा नहीं कर सकते । आप किसी बातका ध्यान न करो, यही नहीं सत्यगुरुने राजाके सब अपराध क्षमा कर दिये, राजा सकुटुम्ब कबीर साहबका सेवक बन गया । राजा तथा रानी बिदा होगये तब ब्राह्मण काजी तथा मुल्ला आदि झुके, कबीर साहबको दण्डवत् प्रणाम करके धन्य कबीर ! धन्य कबीर !! कहते हुए बड़ी नम्रताके साथ उनसे मिलने लगे । उस समय जितने कबीर साहबके सेवक शिष्य थे जिनका विश्वास सद्गुरुको कञ्जरीके साथ देखकर ठीला हो गया था, उनका विश्वास पुनः स्थिर होगया, वे सत्यगुरुकी प्रशंसा तथा गुणानुवाद करने लगे, अपनी मूर्खता तथा अदूरदर्शितापर खेद और दुःख करने लगे, अपने बुरे सन्देह करने पर पश्चात्ताप करने लगे बड़ेही लज्जित हुए ।
वह कौतुक जो होलीके दिवस काशीमें कबीर साहबने किया आज दिवस-पर्यन्त होलीके दिवसोंमें पूर्वके मनुष्य हँसी ठठठा करते हुए कबीर बोलते हैं । कञ्जरी सत्यगुरुकी कृपासे हंस कबीरके साथ मिलकर परम धामको पहुँच गई, जिसका सत्यगुरु हाथ पकड़े फिर उसका बुरा नहीं हो सकता ।
भक्त मीराबाई ।
मीराबाईका यह वृत्तात्त भगतमालमें लिखा है कि, मारवाड़ देशके राजाकी पुत्री थी, मीराकी माता ठाकुर पूजन किया करती थी एक दिवस किसी की बरात आई तो दुल्हा देखनेको सब चले, मीराकी माता अटारीपर चढ़ी देख रही थी । छोटी बालिका मीरा भी अपनी माताके साथ दुल्हा देखनेको गई । मीराने अपनी मातासे पूछा कि, हे माता ! मेरा दुल्हा कहाँ है ? तब मीराकी माँने हँसकर कहा कि, तेरा दुल्हा तो गिरधरलाल है । उसी दिनसे मीराको गिरधरलालसे बड़ा प्रेम हुआ । गिरधरलालकी मूर्तिको एक पेटारीमें रखकर बड़े चावसे पूजने लगी । गिरधरलालमें पूर्ण आसक्त होगई । मीराका उदयपुरके राना के साथ विवाह हुआ । विवाहके पीछे दुरागवन (गर्वने) में अपने घर (श्वशुरा-