भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 626

रमैनी – जमुना तीर पे आसन मारी । बैठे पीर मुरीद^१^ दोऊ पारी ॥
काजी मुल्ला लियउ बुलाई । शेख तक्की तहवां चलि आई ॥
शेख कहै तुम जुल्म जो कीन्हा । फेर मुरीद मेरा क्यों लीन्हा ॥
शेख कहै मुने मतिधीरा । जुल्म कीन्ह तुम दास कबीरा ॥
काजी कह तुम क्या मतपावा । शाहको सदा^२^ कौन सिखलावा ॥
निराकार जो कितेब बखाना । नूर^३^ जोति बाको सब जाना ॥
यही है खुद कि, और निनारा^४^ । ताको हमसे कहो विचारा ॥

साखी – शाहको किमि^५^ समझायो, सबहि दीन सरदार ॥
दोनों राह^६^ कैसे मिटे, यह कुछ बात अपार ॥

कबीर बचन ।

रमैनी – निरंकार है खुदका कीना । इनको तीन लोक जो दीना ॥
इन्हों रचे हैं वेद कितेबा । बिहिश्त वैकुण्ठ इन्हींको सेवा ॥
हमतो इल्म^७^ फ़कीरी बालें । समरथ^८^ नाम लिये जग डोलें ॥

साखी – निराकार निरगुण कहि, राजि रहा संसार ।
पीर पैगम्बर यहाँ रहे, समरथ नूर निनार ॥
कलमा कहूँ तो कल पड़े, विन कलमे कल नांहि ।
जो कलमेसे कलभये, सो कलमा तिस मांहि ॥

कमालजी ।

कबीर साहिबने कमालजीसे कहा कि, हे कमाल ! तुम पश्चिम देशके मनुष्योंको शिक्षा दो । तब कमालजी काशीसे चलकर अहमदाबाद पहुंचे । उस समय अहमदाबादका नवाब मुहम्मद शाहवली बादशाह था । इसके दीवानका नाम दरिया खान था । इसे कमालजीने सत्यपुरुषकी भक्तिमें लगाकर अपना शिष्य कर लिया, कमालजीका शिष्य होगया । ये यहीं निवास करने लगे । ये दिव्य वक्तव्य दिया करते थे, जिन्हें सुनकर वहांवाले इनके वैरी होगये यहांतक कि, वहांका हाकीम भी इनसे द्वेष करने लगा, लोग पत्थर मारने लगे । बादशाहने अपने मंत्रीसे भी कहा कि, तू भी पत्थर मार, उस समय वजीरने उत्तर दिया कि, यह तो मेरे गुरु हैं मैं इनपर पत्थर मारूँ ? यह कैसे हो सकता है, नौवाबने दरिया खांको खूब धमकाया कि, यदि तू पत्थर न मारेगा तो तुझे मंत्रीकी पदवीसे पृथक् कर दूंगा । नौवाबने बहुत धमकाया । उस समय दरियाखाने फूलकी एक पत्ती तोड़कर कमालजीपर चलाई । जब वह उनको लगी तो वे हा हा करके गिर