कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 630, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंचुके थे कि, सहारनपूरमें तो मर गये और बम्बईसे उसी समयमें जीवित होकर फिरने लगे। न जाने और कहाँ कहाँ सैर किया हो बेही जानते होंगे या उनके भक्त जानें दूसरेको क्या पता हो सकता है ?
हंस कबीर जैसे आदिमें थे वैसेही (अजर और अमर) लोकमें अब भी हैं कुछ भी विभिन्नता नहीं है। न उन्हें मृत्यु है, एवं न कभी आवागमन ही होता है न कभी विषय वासनाकी मृगतृष्णाही उनको फँसा सकती है।
गरीब दासजीके * ग्रन्थमें कबीर साहबके चेलोंका अंग।
साखी - गरीब-नानक तो निर्भय किया, वाह गुरु सतजान ।
अदली पुरुष पहचानिये, निर्गुण पद निर्वािन ॥
गरीब-दादूके सिरपर, सदा, अदली अदल कबीर ।
टक मारेमें जदि मिले, फिर सामरके तीर ॥
गरीब-नौलख नानकनावमें, दस लख गोरख तीर ॥
लाख दत्त सङ्गत सदा, पड़े चरण कबीर ॥ ३६ ॥
पारख अङ्गकी साखी।
गरीब-नौलख नानक नावमें, दसलख गोरख पास ।
अनन्त सन्त पदमें मिले, कोटि तरे रबिदास ॥ ३७ ॥
गरीब-रामानन्दसे लख गुरु, तारे चेले भाई ॥
चेलोंकी गिनती नहीं, पदमें रहे समाई ॥ ३२ ॥
गरीब-मीराबाई पद मिली, सद्गुरु पीर कबीर ।
सहित देह लौलीन हो, पाया नहीं शरीर ॥
गरीब-उत्पत्ति परलय जात है, अनन्त कोटि ब्रह्मण्ड ।
जोग जीत समझाय जब, उधरै काग भुसुण्ड ॥ ४८ ॥
गरीब-वसिष्ठ विश्वामित्रसे, आवैं जाँय अनेक ।
काग भुसुण्डके पलकमें, जो चाहे सो देख ॥ ४९ ॥
गरीब-ऐसे काग भुसुण्ड से, योगजीतके दास ।
चकवैं ज्ञान सुनायसे, दीन्हा पदमें वास ॥
गरीब शिवलीको सद्गुरु मिले, सँग भाई मन्शूर ॥
प्याला उतरा अर्श से, काढ़े कौन कुसूर ॥
अचल अङ्गकी साखी ३६२॥
गरीब-मुहम्मदके मुरशिद सही, कलमः रोजा दीन ॥
मुसलमान मानै नहीं, मुहम्मद केर यकीन ॥
गरीबदासजी कृत हिरम्बर बाघ देखो।