भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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रहे । भूमंड भक्त इत्यादिने आपसे बड़ा लाभ उठाया । गरीबदासजीने वहाँ अपने हाथसे एक बगीचा लगाया एवं अनेक लोगोंको कौतुक दिखाया । इसके पीछे जब उनकी मृत्यु हुई तब वहाँ उनकी समाधि तथा छतरी बन गई । उनकी बाटिका उनके सेवक भूमंड भक्तके आधीन रही । कुछ दिनोंके पीछे गोसाईं-जीकी बाटिकाके दोनों बेल मर गये, तब भूमंड भक्तने संकल्प किया कि अब बाटिकाको मैं बेच डालूंगा । जब भूमंड भक्तने ऐसी इच्छा की तब उसी रात गोसाईं गरीबदासजी स्वप्नमें मिले । भूमंड भक्तसे कहा कि तुम बाटिका न बेचो । तुमको आजसे आठवें दिवस अमुक सरायमें एक जोड़े बेल मिलेंगे । तुमको दोनों बेल मिल जावें तो तुम दोनों बेलोंको आरती करके लेआना ।

ऐसा हुआ कि नियत दिवस पर भूमंड भक्त उस सरायमें गये । अपने स्वप्नका वृत्तान्त अपने साथियोंसे पहलेही कह रक्खा था, इस कारण तीस चालीस मनुष्य यह कौतुक देखने उनके साथ सराय गये । जब सब आदमी सरायमें पहुँचे तब देखा तो लुझी पहने हुए एक मुसलमान एक जोड़ी नागौरी बेल लिये हुए खड़ा है । भूमंड भक्तने उसके समीप जाकर कहा कि, यह जोड़ी बेल मुझे दो, वह मुसलमान बोला कि यह जोड़ी तुम कैसे लोगे ? कोई चिन्ह बताओ, तब उक्त भक्तने उत्तर दिया कि, मैं आरती करके लूंगा । वह मुसलमान बेलोंकी जोड़ी सौंपकर चला गया । लोगोंके मनमें यह ध्यान नहीं हुआ कि, पूछें कि, वह मुसलमान कौन था कहाँसे आया, कहाँ चला गया, किसने यह बेल भेजा, कहाँसे ले आया, वह कौन है ? पीछे लोगों को यह बात स्मरण हुई कि, हम लोग बहुत भूले, यह न पूछा कि वह मुसलमान कौन था ! अस्तु भूमंड भक्त तो बेल लेकर चले आये, उनकी बगीची को सींचने लगे ।

सहारनपूरका रहनेवाला शेख बली नामक कलाल, हज्ज करने मक्का गया था जब वह पीछे आकर बम्बईमें उतरा तो वहाँ उसने गरीबदासजीको फिरते देख सलाम करके पूछा कि, महाराज ! आप सहारनपूर से चले आये ? गरीबदासजीने कहा कि, हाँ । उस शेख बलीको यह मालूम नहीं था कि, गोसाईंजी मर चुके हैं । जब शेख सहारनपूरमें आया तब लोगोंसे पूछा कि, गोसाईं गरीबदासजीका क्या हाल है ? तब लोगोंने उत्तर दिया कि, उनको स्वर्गवास हुये तीन बरस बीत गये । उनकी समाधि तथा छतरी बाटिकामें बनी हुई है । यह सुन शेख बली कलालने कहा कि, मैंने तो अभी उनको बम्बईमें फिरते देखा है मुझसे साक्षात् हुआ था । गोसाईंजी उसी स्वरूप, उसी अवस्था और उसी नामसे मुझको मिले, मुझसे भली प्रकार वार्तालाप हुआ । तीन वर्ष हो