कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 628, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंराध क्षमा किया । सत्यगुरुने सबको दयादृष्टिसे देखा सबोंपर उसकी दया हुई सबोंने सत्यगुरुकी आज्ञा मानी एवं सभी प्रसन्नतापूर्वक बिदा होकर वहाँसे अपने स्थानको उछलते कूदते हुए चले आये तथा आज्ञाके अनुसार प्रचार करने लगे । गरीबदास ।
दिल्लीके पास हरियाना प्रान्तमें छोडियानी नामका एक गाँव है । उसीमें एक जाटके घर सम्बत् १७७४ विक्रमीमें गरीबदासजीका जन्म हुआ था । उन्होंने सम्बत् १७९७ विक्रमीमें कबीर साहबका दर्शन पाया था । सत्यगुरुके उपदेशसे गरीबदासजीका अंतःकरण शुद्ध हो गया था । उनकी जिह्वासे ज्ञानमयी वाणीकी झड़ी लग गई थी । उपदेश सुननेवालोंकी भीड़ अधिकाधिक होने लगी, अतएव अन्तमें पन्थ स्थापित हुआ, तो कबीर साहबके बारह पंथ कहे जाते हैं । गरीबदासजी उनमें अन्तिम पंथके आचार्य हैं । अपने ग्रंथमें गरीबदासजीने कबीर साहबकी बड़ी प्रशंसा लिखी है । कृतज्ञ शिष्यका कर्तव्य भी यही होना चाहिये । गरीबदासजी, गुरुकी श्रद्धा भक्ति तथा प्रेममें वैसेही दृढ़ थे । भादों सुदी दूज सम्बत् १८३५ विक्रमीमें, छोडियानीमें अचानक गुप्त हो गये । वहाँ अबभी उनकी समाधि बनी हुई है ; जिसके दर्शनके लिये सालमें कई एक बार मेला लगा करता है ।
ऐसा सुना जाता है कि, गोसाईं गरीबदासजी छोडियानीमें गुप्त होकर फिर राजपुतानामें प्रगट हुये । वहाँ एक दिन जंगलमें फिर रहे थे कि, जयपुर तथा जोधपुरके दोनों राजाओंको दर्शन प्राप्त हुआ । ये राजा उस समय शिकार खेलनेके लिये जंगलमें गये थे इनकी तेजस्विताको देखकर दोनों राजोंने विचार किया कि यह तो कोई बड़े श्रेष्ठ महात्मा हैं । दोनों राजोंने प्रार्थना की कि, महाराज ! हमें अपना शिष्य करलो । गोसाईं साहबने अस्वीकार किया कि हम किसीको अपना शिष्य नहीं बनाते । तब दोनों राजोंने बड़ा हठ किया कि, आप हमें अवश्यही अपना शिष्य बनालें । राजाओंने अत्यन्त विनीतभावसे विनय की कि उस समय गोसाईं गरीबदासजीने कहा कि, तीन नियमोंके स्वीकार करने पर तुम लोगोंको शिष्य करूँगा । प्रथम—अपना अपना आधा आधा राज्य मुझको दो । द्वितीय—अपनी अपनी लड़कीका डोला दो । तृतीय—मुझे पेट भर भोजन करा दो ।
यह बात सुनकर राजाने उत्तर दिया कि, महाराज ! हम अपना समस्त राज्य और अपनी सब लड़कियोंका डोला आपको देवेंगे परन्तु आपको पेट भर खिलानेकी प्रतिज्ञा हम नहीं कर सकते । फिर उनको बिना शिष्य किये ही वहाँसे अन्तर्धान होकर सहारनपुर नगरमें प्रगट हुये । पैंतीस वर्षतक सहारनपुरमें