कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 666, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंके हैं। सब विमुखों तथा अकृतज्ञोंका एक ही ढङ्ग है। सब अपने नाम तथा प्रभुता के इच्छुक हैं। कबीर साहबने धर्मदाससे कहा है कि, हे धर्मदास ! यदि तू मुझ को चाहता है तो तू अपनी मान बड़ाईको त्याग दे, इस संसारसे कोई सम्बन्ध मत रख। धर्मदासने वैसाही किया, जिससे वो सत्यगुरुका स्थानापन्न हो गया। उनके वंशको सत्यगुरुने गुरुवाई प्रदान की।
जितने गुरुविमुख तथा अकृतज्ञ हैं उनका छुटकारा होना जरा असम्भव है। आदिसे अन्ततक कभी भी गुरुकी अकृतज्ञता करेगा तो फिर कालके बंधनमें निश्चय ही पड़ेगा। उसकी कदापि मुक्ति न होगी, न कोई उसकी सहायता ही करेगा। यही बात इस साखीमें लिखी हुई है कि—
साखी—गुरु सीढीते ऊतरे, शब्द विहूना होय।
ताको काल घसीटि है, राखि सकै नहिं कोय ॥
इस कारण गुरुका धन्यवाद और स्तुति सदैव करना चाहिये। क्योंकि, गुरुको छोडते ही सार रहित होजाता है, इसी बातकी विस्तारके साथ इस नमन में कहते हैं—
हम'लके बीचमें झूला^१^। हुआ जब ताप'का शूल^२^ ॥
जले ज्यों^३^ घासका पूला^४^। गुरुका शुक्र^५^ क्यों भूला ॥
हमल मादर^६^में जब सोया। पडा दुःख दर्दसे रोया ॥
वहाँकी अव'ल क्यों खोया। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
वहाँ गुरुसे किया वादा^७^। सो भूला पापसे लादा ॥
यहाँ माँ वाप और दादा। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
य'हाँ दर हाथियाँ डोलें। जवा^८^नौ पर्वतां तौलें ॥
न उन^९^के नामको बोलें। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
किया दावा खुदा^१०^ई का। अमल हल्मो जुदाईका ॥
खबर बिन बे अदाईका। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
रहे महरूम^११^ सो सबसे। भुला एहसान गुरु जबसे ॥
त'नासुखमें पडा तबसे। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
गुरुका आसरा करके। सरेआजिज गुरु चरणधरके ॥
गुन^१२^ह बख'शो मेहर^१३^करके। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
१ पेट, २ घबडाकर हला, ३ जठराकी तापिस, ४ दर्द, ५ जैसे, ६ पूली, ७ मिहरबानी, ८ माता, ९ जान, १० इकरार, ११ इस लोकमें, १२ जीभसे, १३ भगवान्के, १४ ईश्वर होनेका, १५ जुदा, १६ आवागमन, १७ अपराध, १८ मुआफ करो, १९ दया।