कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 667, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुरुको कृतज्ञोंकी प्रशंसा जिस प्रकार स्वयम् कबीर साहब तथा सब ऋषि मुनि करते आये हैं उसी प्रकार गुरुको अकृतज्ञोंकी दुर्दशा का भी वर्णन किया है । इस विषयमें एक उदाहरण देता हूँ कि, किसी समय एक भङ्गिन गोमांसको मदिरा में पका, गन्दे बरतनमें रख शूकर के रक्तसे रंगे हुए वस्त्रसे ढँककर लिये जाती थी ? उससे किसीने पूछा कि, ऐ भङ्गिन ! तू क्या लिये जाती है ? उसने उत्तर दिया कि, गोमांस मदिरामें पका हुआ है, उसको शूकरके रक्तसे रंगे कपड़ेसे इस भयसे ढांके लिये जाती हूँ कि, कदाचित् किसी गुरुविमुखकी दृष्टि न पड़ जावे । इस पर उसकी दृष्टि पड़नेसे मांस अपवित्र होकर भस्म होजावेगा । अकृतज्ञ गुरुविमुख शास्त्रोंमें ऐसाही पतित समझा जाता है कि, ऐसी अपवित्र वस्तुको भी उसकी नजर लग जाय ।
कबीर साहबने रामानन्दस्वामीसे कहा कि—“गुरु मेटे सो आहि चँडारा । भरमें योनि अनन्त अपारा” कितने लोग तो ऐसे हैं कि, पहले बड़ी आधीनताके साथ विनीतभावसे गुरुकी सेवा कर अपना काम निकाल लेते हैं पीछे गुरुकी बात भी नहीं पूछते । गुरुको नामपर धूल डालकर संसारमें अपनी श्रेष्ठता और यश प्रकाशित करते हैं । ऐसे शिष्योंके विषयमें सन्देह है कि, उनसे गुरु अपित अमूल्य पदार्थ कहीं छीन न लिया जाय जिससे वे खालीके खाली रह जायें । यह कथन कबीर साहबका है कि, गुरुका उपकार कभी भी न भूलना चाहिये । यदि गुरुकी कृतज्ञता स्वीकार न करेगा तो अन्तःकरण अशुद्ध हो जावेगा । गुरुकी अकृतज्ञता तथा गुरुविमुख होनेका फल अन्तर वा बाहर सब प्रकारसे प्रगट होगा । गुरु विमुखोंकी बड़ी दुर्दशाएं होती हैं ।
घीसाजी
अभी कुछ दिनोंसे एक घीसा पन्थ भी चला है । कबीरपन्थसे निकला हुआ सुनते हैं । इनका विशेष विवरण अभीतक मेरे पास नहीं पहुँचा है । इस कारण नाममात्र लिख दिया है । यह पन्थ कहीं दिल्लीके समीप सुना जाता भी है । इसके बहुतसे साधु तथा गृहस्थ अनुयायी हैं । मुझ दीनकी जिह्वा तथा लेखनी में इतनी सामर्थ्य नहीं है कि, कबीर साहबके हंसोंकी प्रशंसा व बड़ाई कह अथवा लिख सकें पर जो कुछ होसका है विशुद्ध श्रद्धासे किया है । कबीर साहबके अनन्त हंस हैं, उनके अनन्तही पन्थ हैं, करोड़ों असी ब्रह्माण्ड हैं, जिसमें हंस कबीर ईश्वरीय शासन कर रहे हैं, वे सब सत्यगुरुके आज्ञाकारी हैं । किसीकी सामर्थ्य नहीं कि, साहबसे विमुखता कर सके । जो कोई साहबकी आज्ञाके विरुद्ध कार्य करता है वो तत्कालही ऐसा दण्ड पाता है कि, फिर कभी उसे कुछ करनेका साहस नहीं हो ।