भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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गुप्त जाप जानें जब कोई । कहैं कबीर मुक्ति भल होई ॥
कथा कीरतन गदगद वाणी । मुक्ति न होय बिना सहिदानी ॥
केता कहूँ कहा नहि जाई । नाम गहे सो पुरुष मिलाई ॥
सार शब्द परवाना दइहैं । जीव छोडाय कालते लइहैं ॥

साखी—जैसे फण पति मंत्र लखि, फणको रहे सकोरि ।

तैसे नाम कबीर लखि, काल रहे मुख मोरि ॥

जो जन होइहैं जौहरी, सो धन लेई बिलगाय ॥

सोहं सोहं जपि मुये, मिथ्या जन्म गँवाय ॥

साखी पद संसारमें कहन सुननको दीन ।

जाको चीठी मूलकी, सोले साधन कीन ॥

चौ०—कोटि यतन कर जिव समझावे । भाग बिना सो नाम न पावे ॥

गुरुकी सन्धि सन्त तेहि पासा । सो नहि परे कालके फाँसा ॥

आदि पुरुष अपना कर जाना । सोई भक्ति अन्तरगत ठाना ॥

तुमको दीनी भगति अपारा । नाम अजर तुम जपो हमारा ॥

जो नहि बूझे कहा न करई । मुक्ति न होय नरकमें परई ॥

श्रवणनमें कह दीन्हा नाऊँ । ताहि बोलहू अपने ठाऊँ ॥

नाम सुनै औ मोंको जाने । यमराजा तेहि देखि डेराने ॥

मेरो नाम अमर है भारी । ताहि नामको राखु सँभारी ॥

तजि अभिमान मिलै जो आई । ताको दीजै नाम दूढाई ॥

सब तजि रहनि रहे ठहराई । और तजे सब लोक बढाई ॥

ताको दीजे वस्तु अपारा । कह कबीर सुनु शब्द हमारा ॥

गलित गरीबी रहन सम्हारे । तन धन मन सन्तनपर वारे ॥

लोक लाज कुल तेज बढाई । तब पग परस भरम मिटि जाई ॥

बिन विश्वासन भगति प्रकासा । प्रीति बिना नहि दुबिया नासा ॥

गुरुते शिष्य करे चतुराई । सेवाहीन नरकमें जाई ॥

वारै तन मन औ धन धाना । सोई सन्त मेरे मन माना ॥

कहैं लगि कहूँ वार नहि पारा । नाम गहे सो सन्त हमारा ॥

आदि नाम है शरकी गौसी । लागै बान पडा रह जासी ॥

जब लगि भक्ति अङ्ग नहि आवै । सार शब्दसो कैसे पावै ॥

सत्यनाम श्रवन धुनि होखे । जो मतवाला ताको पोखे ॥