कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 680, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुप्त जाप जानें जब कोई । कहैं कबीर मुक्ति भल होई ॥
कथा कीरतन गदगद वाणी । मुक्ति न होय बिना सहिदानी ॥
केता कहूँ कहा नहि जाई । नाम गहे सो पुरुष मिलाई ॥
सार शब्द परवाना दइहैं । जीव छोडाय कालते लइहैं ॥
साखी—जैसे फण पति मंत्र लखि, फणको रहे सकोरि ।
तैसे नाम कबीर लखि, काल रहे मुख मोरि ॥
जो जन होइहैं जौहरी, सो धन लेई बिलगाय ॥
सोहं सोहं जपि मुये, मिथ्या जन्म गँवाय ॥
साखी पद संसारमें कहन सुननको दीन ।
जाको चीठी मूलकी, सोले साधन कीन ॥
चौ०—कोटि यतन कर जिव समझावे । भाग बिना सो नाम न पावे ॥
गुरुकी सन्धि सन्त तेहि पासा । सो नहि परे कालके फाँसा ॥
आदि पुरुष अपना कर जाना । सोई भक्ति अन्तरगत ठाना ॥
तुमको दीनी भगति अपारा । नाम अजर तुम जपो हमारा ॥
जो नहि बूझे कहा न करई । मुक्ति न होय नरकमें परई ॥
श्रवणनमें कह दीन्हा नाऊँ । ताहि बोलहू अपने ठाऊँ ॥
नाम सुनै औ मोंको जाने । यमराजा तेहि देखि डेराने ॥
मेरो नाम अमर है भारी । ताहि नामको राखु सँभारी ॥
तजि अभिमान मिलै जो आई । ताको दीजै नाम दूढाई ॥
सब तजि रहनि रहे ठहराई । और तजे सब लोक बढाई ॥
ताको दीजे वस्तु अपारा । कह कबीर सुनु शब्द हमारा ॥
गलित गरीबी रहन सम्हारे । तन धन मन सन्तनपर वारे ॥
लोक लाज कुल तेज बढाई । तब पग परस भरम मिटि जाई ॥
बिन विश्वासन भगति प्रकासा । प्रीति बिना नहि दुबिया नासा ॥
गुरुते शिष्य करे चतुराई । सेवाहीन नरकमें जाई ॥
वारै तन मन औ धन धाना । सोई सन्त मेरे मन माना ॥
कहैं लगि कहूँ वार नहि पारा । नाम गहे सो सन्त हमारा ॥
आदि नाम है शरकी गौसी । लागै बान पडा रह जासी ॥
जब लगि भक्ति अङ्ग नहि आवै । सार शब्दसो कैसे पावै ॥
सत्यनाम श्रवन धुनि होखे । जो मतवाला ताको पोखे ॥