कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 681, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाखी—सुरति समावे नाममें, जगते रहे उद्दास ॥
कहैं कबीर गुरुचरण (में), दूढ राखै विश्वास ॥
चौ०—जगमें जेते हैं विश्वासी । माया आहि ताहिकी दासी ॥
जाके दिल विश्वास न आवे । भक्ति अङ्ग सो कैसे पावे ॥
जो जिव मायासे मन लावे । गहे काल मुख बात न आवे ॥
साखी—गुरुकी, शब्द साधुकी पूंजी, वनिज करे जो कोय ॥
कहैं कबीर सवाई बढे, हानि कबहुँ ना होय ॥
चौ०—जाको है गुरुको विश्वासा । निश्चय जाय पुरुषके पास ॥
कहैं कबीर मिलै विश्वासी । बिन विश्वास है यमकी फांसी ॥
सोहं कोहं आये संदेशा । सो गुरु दीन्हो मोहिं उपदेशा ॥
ताको मर्म जान जो पावे । सो तो नहिं भवसागर आवे ॥
गुरुको शब्द जीव दूढ धरई । सोई सन्त भवसागर तरई ॥
होई न दास धरै अभिमाना । ताहि न दीजै अनुभव ज्ञान ॥
नाम मालमें परिचय आने । सकल सन्तमें सद्गुरु जाने ॥
साखी—पुरुष सबनते न्यार है, और सबनके माहिं ।
ज्ञान दृष्टि करि देखहूँ, साखी पदमें नाहि ॥
साखी पदमें सो पढें, पुरुष बसे तेहि पार ॥
पोथी वाणी भेष बहु, सो सबहिन ते न्यार ॥
गुरु पूरा सुख शूरा, बाग मोडि रण पैठ ।
सत्य सुकृतको चीन्हके, एक तख्त चढ़ि बैठ ॥
सुकृतआदिभेदसे ग्रन्थ ।
चौ०—चले ज्ञानी समरथ शिर नाये । मकर तार होय तिरबेनी आये ॥
जहाँ काल बैठा अन्याई । ज्ञानी बेगि तहाँ चलि आई ॥
देखि काल बहुतै दुख पावा । उठि ज्ञानीके सन्मुख धावा ॥
कौन अंश तुमहो बटपारा । हमरे झांझरिमें पग धारा ॥
ज्ञानी वचन
कहैं ज्ञानी जनि जाव भुलाई । सोहं पुरुष सन्धि हम लाई ॥
समरथ हुकुम मान तुम भाई । नहिं तो बांध तोहिं ले जाई ॥
अब जनि भूलो मूर्ख गँवारा । छिनमें करूँ तोर संहारा ॥
यह सुनि काल उठा रिसियाई । विकल रूप होइ सन्मुखधार्ई ॥
बारह बाण काल ले आई । ज्ञानी शब्दसे लीन्ह बचाई ॥