कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 688, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंचार मुक्काम पर खण्ड सोलह कहें अण्डको छोड़ि वहाँ ते रहाई ।
सहस्र और द्वादशे रूह है संगमें करत किलोल अनहद बजाई ॥
तासुके वदनकी कौन महिमा कहूं भासती देह अति नूर छाई ।
महल कञ्चन बने माणिक तामें जड़ बैठि तहाँ कलस अखण्ड छोजे ॥
अचिन्तके परे स्थान सोहंका हंस छत्तीस तहाँ विराजे ।
नूरका महल और नूरकी भूमि है तहाँ आनन्द सो द्रन्द भाजे ॥
करत किलोल बहु भांतिसे सङ्ग येक हंस सोहं की जो समाजे ।
हंस जब जात षट्चक्रको भेदिके सात मुकाममें नजर फेरा ॥
सोहंके परे जो सूति इच्छा कही सहस्र बावन जहाँ हंस हेरा ।
रूपके राशिते रूप उनको बना नहीं उपमा दूजे बनेरा ॥
सुरतिसे मेटिके शब्दके टेक चढ़ि देखि मुक्काम अंकूरकेरा ।
सुन्नके बीचमें विमल बैठक तहाँ सहज स्थान है गैबकेरा ॥
नवें मुक्काम यह हंस जब पहुँचि या पलक विलम्ब वहाँ किया डेरा ।
तहाँ से डोर मकरतार जो लागिया ताहि चढ़ि हंस गो दे दूरेरा ॥
भये आनन्दसे फन्द सब छोडिके पहुँचा जहाँ सत्यलोक मेरा ।
दूसरा झूलना
जुलमत नासूत, मलकूत में फिरिश्ते, नूर जल्लालजबरूतमें जी ।
लाहूतमें नूर जम्माल पहचानिये, हक मकान हाहूतमें जी ॥
बका याहूत, साहूत, मुरशिद रहे, जोय अंकूरराहूतमें जी ।
कहत कबीर अविगत आहूतमें, खुद है खाविन्द जाहूतमें जी ॥
शब्द-सा'ई तेरा अर्शतख्त' है दूर ।
बिन मुरशिद' कोई भेद न पावे भटक भुये सम क्रूर ॥
चौदह तबक' खाबकी रचना आतिशकासा फूल ।
लाज छोड़ि जिन काज किया है भये चरणके धूल ॥
नासूतमें' माया खड़ी मलकूत गुण अस्थूल ।
जो कोई निजको समझि बूझे तामें नाहीं भूल ॥
जिबरूतमें जम जाल है लाहूत अच्छर मूर ।
हाहूतमें अचिन्त पुरुष है बजत अनहद तूर ॥
वेद पुराण कुरान गीता यहां लग खबर जहूर ।
सोहं इच्छा यहांसे आये सब घट व्यापक नूर ॥