कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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सब जीवनको त्रास देखिके समरथ वचन कबूल ।
कहे कबीर हम खुदके अह्दी लाये हुकम हुजूर ॥
निम्न लिखित शब्दमें योग और वेदान्तका रहस्य अत्यन्त गंभीरताके साथ भरा हुआ है बड़ी ही उच्च कोटिका है...
- यथा—यह जग पारख बिना भूलाना ।
निर्गुण सर्गुण दोकर थापै अजपा धरि धरि ध्याना ॥
निर्गुण वंश सरगुण गुण रहितम गुण विन कहा समाना ।
द्वैत ब्रह्म सकल घट व्यापै त्रिगुणमें लपटाना ॥
आवै जाय उपजे फिर विनसै जरि मरि कहाँ समाना ।
सहस पाखुरी कमल विराजै मन मधुकर लपटाना ॥
जलके सूखे कमल कुम्हलाना तब कहु कहाँ ठिकाना ।
छओ चक्रवर्ति चार चतुर्दश वेद मती अरु ज्ञाना ॥
बद्ध नालकी डोरी खींचें योगिन युगति वखाना ॥
घरमें कर्ता लोग बोलत हैं पांचो तत्त्व नशाना ॥
करे विचार सकल मिलि ऐसा भेष विविधि विधि बाना ।
कहै कबीर कोई गुरुगम पावे पहुँचे ठौर ठिकाना ॥
अब यहां मैं कुछ बातें कबीर साहब तथा निरंजनकी वार्तालापकी लिखता हूँ । जिसमें पाठकगणोंको कालपुरुष तथा सत्यगुरुका विवेक हो जाय. क्योंकि, जब
- यह संसार सच्चे गुरुके बिना भटकता फिरता है । अजपा गायत्रीका भजन ध्यान करने मात्रहीसे ब्रह्मवेत्ता बनकर निर्गुण सगुण दो भेद एकही ब्रह्मके कर डाले पर यह तो बता कि जब निर्गुणका पसारही सगुण है तो वो निर्गुण बिना गुणका होकर सगुण कैसे हो गया उसका निर्गुणपना कहाँ चला गया ? त्रिगुण प्रधानसे लिप्ट जानेके कारण ही ब्रह्मा द्वैत हुआ है वही जीव बन कर घट २ में रम रहा है वो शरीरके साथ जन्म मरण और आवागमन कर रहा है लिङ्गशरीरके भेद हो जाने पर तो कहाँ जाकर समावेगा यदि लय मानोगे तो । समाधिकालमें मनन करनेवाला जीव मूर्धके सहस्रदल कमल पर भारिकी तरह लिप्टता है अथवा अनेकों कणिकाओंवाले हृदय कमलमें ध्यान अवस्थामें मन स्थिर होकर भगवान्के स्वरूपका ध्यान करता है पर जब पानीके सूख जानेपर वो कमल कुम्हिला जायगा तब इस मनका कौनसा ठिकाना होगा । इतना पदार्थ काकूके अनुपममें कहकर अब स्पष्टरूपसे कहते हैं कि योगियोंने जो योगकी युक्ति बताई है उसके अनुसार वंकनाल (सुषुम्नाका सिरा) की डोरी (अपान) खींचकर छओ चक्रोंको भेदकर तथा चौदहवें स्थानमें पहुँच वहाँकी अलौकिक वेद मती और ज्ञान प्राप्त करके वहाँ पहुँच जाता है । यहाँ पांचों तत्त्व नष्ट हो जाते हैं जीव आत्मरूप हो अपनेको सब कुछ कहने लगता है तथा कर्ता भी अपनेको समझता है । इस लोकमें पहुँचनेकी तो सभी भेष तयारी करते हैं पर जिसे पारख गुरु मिलेंगे वही उस स्थानको पहुँचैगा दूसरा नहीं पहुँच सकता ।