भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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तक उसके स्वरूपका ज्ञान नहीं होता तबतक कालपुरुषसे छूटना कठिन है दूसरे 'संग्रह त्याग न विनू पहिचाने, यानी त्याग और ग्रहण भी तो बिना जाने नहीं होता।

स्वसंबेदके फूटकर उपदेश

साखी-तीरथ गयेते एक फल, सन्त मिलै फल चारि।

सद्गुरु मिले अनेक फल, कहै कबीर विचारि ॥

तीर्थके जानेसे तो केवल एकही फल अर्थात् पापका नाश होता है। सन्तके मिलनेसे चारों फल अर्थात् अर्थ आदिक अनेक फल मिलते हैं। भलाजी ! यदि कोई कहे कि, मोक्षसे बढ़कर क्या है, जो सत्यगुरुके मिलनेसे मिलता है ? सो जानना चाहिये कि, चारों फल तो केवल चारों स्थानोंतक हैं और स्थानोंकी सुधि तो केवल सत्यगुरुही द्वारा होती है, वे वे बातें तथा पदार्थ मिलते हैं जो कहने सुननेमें भी नहीं आते। सब बातें सत्सङ्ग द्वारा प्राप्त होती हैं। सत्सङ्गहीसे सार शब्दका चिन्ह तथा पता लगता है।

सत्यकबीर बचन

सारं निरक्षरं शाब्दं कथ्यते सुजनैर्जनैः।

तद्ज्ञाता यदि लभ्येत शीघ्रं पुण्यफलानि च ॥

निःअक्षर जो सारशब्द है जिसकी प्रशंसा श्रेष्ठगण करते आये हैं उसके ज्ञाताओंको सब शुभकर्मोंका फल मिलता है ॥

गया गङ्गा प्रयागं च व्रतं दानं तथैव च।

सारशब्दसमा एते न भवन्ति कदाचन ॥

गया, गङ्गा, प्रयाग आदि तीर्थ व्रत दान इत्यादि कोई भी सार शब्दकी तुल्यता नहीं कर सकते यानी सहस्रों प्रकारोंके तीर्थ, व्रत, दान, यज्ञ और तपस्या साधन किया करे पर सारशब्दकी समता नहीं कर सकता ॥

कल्पकोटिसहस्राणि काशीवासे च यत्फलम्।

क्षणार्द्धं चित्तिं शब्दे भवेत्स्य ततोऽधिकम् ॥

करोड़ों कल्प काशीमें रहकर जो फल प्राप्त होता है वही फल यदि केवल आधे क्षणतक सारशब्दका ध्यान करनेवाला अनायास पाजाता है ॥

अब विचारना चाहिये कि, सहस्र चौकड़ी युगका एक कल्प होता है। ऐसे करोड़ों कल्प काशीमें जो कोई रहे उससे भी बढ़कर फल सारशब्दके आधे क्षणके ध्यानमें है। जिस सार शब्द तथा जिसके आधेक्षणके ध्यानके सामने करोड़ों कल्प तुच्छ हैं, पर सारशब्द बिना सत्यगुरु सत्य कबीरकी दयाके किसीको नहीं मिल सकता। इसी कारण सत्सङ्गकी श्रेष्ठता वेद तथा सभी सत् करतें चले आये