कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 707, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुम्ही मसजिद-व बुत खानः में बैठा । तुही सब जीवके अन्दर है पैठा ॥
तु नफसानी हवा आलम में छोड़े । तुम्ही फिर आप अपनी बाग मोड़े ॥
अमल के दामको तूने बनाया । नहीं और अमरमें सबको फँसाया ॥
फसे जिस हालमें सब रुहे मुरगा । न पहचाने कोई कौले बजुरगों ॥
रजा और बीमकी दो मेख मारा । मुसल्लम दामको उस पर पसारा ॥
बहर किस्मे हवस लज्जात दाना । फँसे आ जिस ऊपर मुर्गं जमाना ॥
कहीं भगवा तिलक कण्ठी है माला । कहीं खुद भेष घर बैठे निराला ॥
कहीं यह दिल हुआ हिन्दू मुसलमां । कहीं जिन्नो परी और हूरोगिलमा ॥
कहीं औतार धर अल्ला कहावे । कहीं हरि भगत हो हरिगुणको गावे ॥
कहीं फासिक मुहब्बत यार खाली । कहीं आशक हुया रोडा जलाली ॥
बहरसू देखिये दिलका तमासा । जहाँ कौनेन पानीका बतासा ॥
इस गजलमें चित्तकी सर्वोत्कृष्ट महत्ता वर्णन की है कि, खुदा आदि सब कुछ तू है ।
इस चित्तके इतने नाम हैं—मन, चित्त, अहंकार, स्वातः; जब मनुष्यका मन राग द्वेषमें फँसता है तब नसोंमें विभिन्नता आजाती है । जो नसें रक्त तथा वीर्य स्थान स्थानपर पहुँचाती हैं, उनमें दोष आजाता है । जैसे बादशाहके दुःख अथवा क्रोधसे समस्त सैन्य क्रोधाग्निवत होती हैं अथवा दुःखी होती है, उसी प्रकार मनमें विभिन्नता आनेसे समस्त नसोंमें विभिन्नता आजाती है । तब दोनों प्रकारके रोग होते हैं क्योंकि, नाडियोंमें विभिन्नता पड़नेसे अन्न नहीं पचता, कच्छा रह जाता है तब शारीरिक रोग और मानसिक चिन्ता घेरती है ।
जीव, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार यह सब अशुद्ध चित्तका नाम है । जितना दृश्य दिखाई देता है वो सब मनका रूप है । मन तथा कर्म दोनों समान स्वरूपके हैं । जब मन वशमें आता है तब समस्त कर्म भरम मिट जाते हैं । यह मन ब्रह्म शक्तिका बल है, इस कारण ब्रह्म और मनमें कुछ विभिन्नता नहीं । इस मनहीकी गतिसे देवता राक्षस हो जाते हैं और राक्षस देवता बन जाते हैं । मनुष्य नाग, नाग मनुष्य, पुरुष स्त्री, स्त्री पुरुष, पुत्र पिता और पिता पुत्र हो जाते हैं । जैसे तमाशा करनेवाला शीघ्रतापूर्वक भांति भांतिके रूप दिखाता है फिर पलट लेता है । कबूतर जिस प्रकार गिरह मारता जाता है, उसी तरह आवागमन भी होता जाता है । जब मन विषय वासनासे विरक्त होता है तब मनहीसे मन मुरदा हो जाता है जैसे ठण्डा लोहा गरम लोहेको काट डालता है ।