कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 708, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह मन कालपुरुष है, समस्त संसारको इसने भटकाकर खा लिया है। पर जब यह भक्तिकी ओर ध्यान देता है तब परमपदको पहुँचा देता है, अपने यथार्थसे संयुक्त कर देता है। सुतरां दत्त, दिगम्बर, दुर्वासा, नारद, गोरखनाथ, मीराबाई इत्यादिको सत्यगुरु मिल गये जिससे उनका कार्य सिद्ध हो गया। जब मनुष्यका सुकर्म पूर्णताको पहुँचता है तब सत्यगुरु प्राप्त हो मनुष्योंको यथेष्ट स्थानपर पहुँचा देता है। ग्रन्थ कबीर वाणी तथा अन्यान्य ग्रन्थोंमें लिखा है कि, जब कबीर साहब झांझरी द्वीपको गये, तब उस समय कालपुरुषने कबीर साहबसे कहा कि, आप अपनी देह मुझको दे। कबीर साहबने कृपा करके अपनी देह उसको देदी। इस कारण कालपुरुषके पास दोनों देह हैं। जब चाहे तब अपनी देह दिखावे और जब चाहे तब सत्यगुरुकी देह धारण करे। बे शिरकी देह कालकी है और माथा सहित देह कबीर साहबकी है जो उसको प्रदानकी गयी है। परिणाम यह है कि, जो कोई भजन और तपस्याको उच्चश्रेणीपर पहुँचाता है और उसका प्रेम सच्चा होता है तो उसी कालकी मूर्तिमेंसे दयालु सत्यगुरु निकलकर जीवका कार्य सम्पूर्ण कर देते हैं। इस कलियुगमें मनुष्यसे सुकृति और भजन भक्ति पूर्ण नहीं हो सकते; इस कारण उसे सत्यगुरुकी शरण ग्रहण करना आवश्यक है। शरणका कर्तव्य पूर्ण करनाही शुभकर्मकी अवधि है। अपने शरीरकी आशा पूर्णतया छोड़ दे। दिनरात भजन तथा ध्यानमें निमग्न हो जावे, अपने शरीरको तुच्छ समझकर अपने प्यारे के मिलनेके अनुरागमें विह्वल होकर प्रार्थना करे। जब पूर्ण विरहमें निमग्न हो जावेगा तो एक न एक दिन उसे अवश्य दर्शन होगा।
शब्द- गुलतान मता जब आवेगा तब जिवड़ा सुख पावेगा,।
आचार विचार छुटे या जिवका दुर्भति दूर नसावेगा ॥
मायामोह भरमका बादल परदा खोल बहावेगा।
पाँचपचीस करो सब अपने सद्गुरु शब्द लखावेगा ॥
रहनि गहिनकी नाव सँवारो तब भव पार सिधावेगा।
हंस सुजन जन बहुरि मिलैंगे साहबके गुण गावेगा ॥
अमरलोक अमृतकी काया तहाँ बड़ा सुख पावेगा ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो यह तत् बिरला पावेगा ॥
इस प्रकार प्रेममें मग्न होनेसे सत्यगुरुका दर्शन होता है यदि कोई कहे कि, जब इस प्रकारकी निमग्नता हुई तब आपसे आप काम हो जावेगा फिर सत्यगुरुका क्या काम है। उसे जानना चाहिये कि, कितनाही भजन क्यों न करे,