कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 709, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपर सत्यगुरुकी कृतज्ञता न हो तो छुटकारेका ढंग न होगा, क्योंकि, सहस्रोंने बहुत प्रेम किया, सत्यगुरु उनको मिले भी पर उनके मनमें घमण्ड रहा । वे सत्य-गुरुके चरणके धूल न हुये इस कारण संसारमें ही फँसे रहे ।
शब्द—मनरे तू मनही उलट समाना ।
गुरु परताप अल्क भइ तोको नातो था अज्ञाना ॥
नियरेतं दूर दूरते नियरे जो जैसे अनुमाना ।
आलूते कोचढोमिलवेड़ा जिन रहे पियातन जाना ॥
उलटि कमल षट्चक्रहि वेधै सहज शून्य अनुरागी ॥
आवेन जाय मरे नहिं जमने ताही को कहो जो बैरागी ॥
बंकनालकी सुधिकर वौरे मेरुदण्ड कर छाजा ।
गरजे गगन मन शून्य समाना बाजे अनहृद बाजा ॥
या मनले केते अरुझाने शिव सनकादिक ब्रह्मा ।
खोजत खोजत पार न पायो अगम अपार याकी महिमा ॥
यह मन मस्त बसे बन कुञ्जर शून्य सकल बन खाया ।
जब वश पन्यो महावत केरे अङ्कुकुश दे मुरकाया ॥
जो मन कहो जो तू काहे को संशय जिन खोजा तिन पाया ।
रहे समाय अभय सागरमें बहुरि न भवजल आया ॥
अनुभव कथा कौनसे कहिये है कोई सन्त विवेकी ॥
कहैं कबीर गुरुदया है पलीता सूझल विरले देखी ॥
यथा—मन तू थकत थकत थकि जाई ।
बिन थाके तेरो काज न सरि है फिर पीछे पछताई ॥
जबलग तू सजीव रहत है तब लग परदा भाई ।
टूट जाय ओट तिनकाकी जो मन शिखर ढहाई ॥
सकल तेज तज होय नपुंसक या मत सुन तू मेरी ।
जीयत मृतक दशा विचारे पावे वस्तु घनेरी ॥
याके परे और कछु नाहीं या मत सबसे पूरा ।
कहैं कबीर मार मन मैगल होय रहो जैसे धूरा ॥
जिस मनुष्यको अपनी कामनाओंको छोड़ना कठिन है वह वासनाओंका कीड़ा है । कामनाओंके पूर्ण करनेसे मन मोटा हो जाता है स्थूल होकर ऐसा बलवान् हो जाता है कि, फिर बशमें नहीं आता । जब मनुष्य कामनाओंको छोड़ देता है जिस पदार्थ पर मन जाय उसको स्वीकार नहीं करता तब यह मन मुरदाके समान होजाता है ।