भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उस समय अक्षर ब्रह्म निद्राके वशीभूत हुआ अक्षरके ध्यान और सत्यपुरुषके शब्दसे एक अण्डा उत्पन्न हुआ वह अण्डा जलपर उतराता फिरता था । जब अक्षरकी नींद टूटी तब उसने अपने सामने जलके ऊपर तैरता हुआ एक अण्डा देखा और उस अण्डेके ऊपर एक वृत्तान्त लिखा गया पाया और वह वृत्तान्त सत्यपुरुषकी ओर से लिखा गया था, कि “हमने एक पुत्र भेजा है जो तुम्हारी बराबरी करेगा वह जहांतक आवे उसको आने देना, तीनलोक भवसागरका वह राज्य करेगा। सत्तरह असंख्य चौकडी युगतक उसके राज्यकी अवधि है—सो वह जब सत्तरह असंख्य चौकडी युग राज्य और भवसागरपर शासनका ठेका पूरा कर लेगा। तब वह हमारे समीप चला आवेगा। तदुपरान्त तुम्हारे शासन और अधिकारका समय आयेगा, जब तुम्हारा समय आवेगा तब सब मनुष्य मुक्त हो जावेंगे” इतना वृत्तान्त उस अण्डेके ऊपर लिखा हुआ था सो सब अक्षरने पढ़ लिया। जब अक्षरने वह पढ़लिया और जानलिया तब अक्षरके सामनेही उसके देखतेर वह अण्डा फूटा और उसमेंसे अत्यंत प्रबल कालपुरुष उत्पन्न हुआ तब अक्षरने उसको निरंजन कहकर पुकारा। इसी कारण उस कालपुरुषका नाम निरंजन पड़ा । (देखो उसका वृत्तान्त कबीरसाहब, ग्रन्थ कबीरवाणीमें लिखते हैं) ।

उसी अण्डेकी सूचना ऋग्वेदके असर्वोपनिषदमें लिखी है “जलके ऊपर अंडेका एक आकार प्रगट हुआ वह आकार स्थिर था फिर उस अण्डेमें मुँहके स्थान एक छिद्र प्रगट हुआ और उस मुँहसे अग्नि देवता उत्पन्न हुए, फिर नेत्रके स्थान दो छिद्र प्रगट हुए, इसी प्रकार सब इन्द्रियाँ प्रगट होगयी—” इसी अण्डेके विषयमें मनुसंहिताके पहले अध्यायमें लिखा है, देखो :—

“तदण्डमभवद्वैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ।

तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ ” (मनु. अ. १ श्लो. ९)

उसी अण्डेसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, जो समस्त संसारके पिता और समस्त पिताओंके पिता हैं । यही बड़ा ब्रह्मा है और इसी मायावीकी माया समस्त संसार है।

फिर उसी अण्डेका उल्लेख तौरैतमें उत्पत्तिकी किताबमें है कि, सबसे पहले जल था और उस जलपर खुदाकी रूह कबूतरके सद्गुण तैरती फिरती थी—इसीका विवरण जबरूम है कि, खुदाबन्द जलोपर गरजता है।

उसी अण्डेका समाचार समावेदमें है कि, एक अंडेके दो भाग हुए, आधेसे