भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृथ्वी हुई और आधेसे आकाश, हुआ ; वेही दोनों स्त्री पुरुष हुए, और समस्त संसारमें फैल गये.

उसी अण्डेका सभाचार योहन्ना इञ्जीलमें प्रगट करता है, यही अण्डा समस्त संसारका सृष्टिकर्ता तथा स्वामी है, वही शब्द है उसे शब्द कहो वा वाणी कहो—यही अंडा आदिमें प्रगट हुआ.

यही प्रथम ब्रह्म वा ब्रह्मा माना गया है ।

कबीर साहबने कहा है कि, यह कालपुरुष सत्यपुरुषकी क्रोधाग्निके भागसे उत्पन्न हुआ इससे यह पूर्णतया अग्नि है । यही कुल जगतको भस्म करनेवाली आग है, और उसमें अहंकार बहुत है इसके शरीरको सत्यपुरुषने विषय वासना द्वारा निर्मित किया है इसलिये यह शारीरिक भोग वृत्तियाँ और राज्य प्रभुत्व तथा अन्यान्य सांसारिक कामनाओंसे परिपूर्ण है, इसके गृह सतपुरुषने ऐसेही बनाये हैं । तीन लोकमें जितने जीवधारी हैं सो सब उसीकी संतति हैं और इसी का प्रभाव तथा विष समस्त देहधारियोंमें प्रवेशित हुआ है । यह अनेक नामोंसे इस संसारमें विख्यात हुआ है । इसका सबसे पहला नाम तो निरंजन है, काल, कैल, अंकार, ओङ्कार, निरंकार, निर्गुण, ब्रह्म, बह्मा, धर्मराज, खुदा, अल्ला, करीम, ब्रह्म, अद्वैत, केशव, नारायण, हरि, हर, विश्वम्भर, वासुदेव, जगदीश, जगन्नाथ, जगत्पति, राजेश्वर, ईश, परमेश्वर, विश्वनाथ, खालिक, रब, रबिल आलमीन, हक, इत्यादि अनन्त नाम इस कालपुरुषके हैं और वेदों तथा पुराणोंमें सब उसीके नाम हैं और समस्त भूमण्डलमें उसी जगदीश्वरकी श्रेष्ठता और बंदना पूजा कही है और इसीकी आज्ञापालनमें और पूजनमें समस्त संसार संलग्न है और इसी अग्निकी पूजन बंदन हो रही है, उस परमेश्वरका मुँह अग्नि है इसीलिये जो कुछ उसके नामसे आगमें डाला जाता है सो सब उसीको पहुँचता है । बलिप्रदान और महाबलिप्रदान सब इसी परमेश्वरके निमित्त हैं और यही परमेश्वर तीन लोकमें पूजा जाता है इस भवसागरमें इसीका राज्य और अधिकार है सब प्राणी उसीके अधीन हैं और उसीका नाम जपते हैं ।

छठी प्रकरण

कालपुरुषके तप करके तीनोंलोकका राज्य पानेका वर्णन

इच्छाओंसे आकर्षित हुआ यह कालपुरुष, एक चरणसे खड़ा होके तप करने में तत्पर हुआ और सत्तर युगों पर्यन्त बराबर एकही पगसे खड़ा होके सत्य पुरुषका