कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 712, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूरा होता है। यदि विरुद्ध मिले तो उस स्त्रीका प्रेम अपने पतिसे नहीं होता। उसमें मन नहीं लगता। अपने उपपति को ढूँढ़ती फिरती है। वह जिसके साथ विवाही जाती है वह तो उसका पति नहीं। इस कारण कामाग्नि उसके हृदयको जलाती रहती है। तब मस्त फिरती है और धूर्त तथा व्यभिचारिणी हो जाती है। जब तक उसका पति नहीं मिलता तब तक उसके कामकी अग्नि शान्त नहीं होती।
मायाने अपने तीन स्वरूप बनाया है वे जड़ चैतन्य और वाणी हैं जड़ तो चाँदी सोना रत्न आदि हैं। चैतन्य स्त्री है वाणीमें समस्त वेद पुस्तकें और वाणी विद्या इत्यादि संयुक्त हैं। इन तीनों स्वरूपसे उसने समस्त संसारको अपने वशीभूत कर लिया है। बिना तात्पर्य समझे वेद और वाणी पढ़ पढ़ सभी मस्त होकर इस बाणीमें डुबकियां खा रहे हैं। इस वेद बाणी रूप समुद्रका भेद किसीने नहीं पाया। पढ़ा तो सही पर यथार्थ भेदको नहीं जान सका। इस कारण उनका पढ़ना निरर्थक हुआ। इससे कुछ मनकी स्वच्छता नहीं हुई। क्योंकि जो सत्य तात्पर्य है उसको नहीं सूझा न मनमें विचार आया।
(कबीर साहबकी) शब्द अङ्गकी साखी
कबीर—एक शब्द गुरु देवका, तामें अनंत विचार।
पण्डित थाके मुनि जना, वेद न पावें पार ॥
कबीर—आसा बासा सन्तकी, ब्रह्मा लखे न वेद।
षट् दर्शन खटपट करें, विरला पावें भेद ॥
कबीर दीपक जोइया, देखा अपरं देव।
चार वेदकी गम नहीं, तहां कबीरा सेव ॥
कबीर—ऐसी अद्भुत मत कथो, कथो तो धरो छिपाय।
वेद कुरानों ना लिखी, कथों तो को पतियाय ॥
कबीर—माँ मूँडूँ ता गुरुकी, जाते भरम न जाय ॥
आप बूड़े चहुँ वेदमें, चेले दियो बहाय ॥
कबीर—बाणी तो पानी भरे, चारों वेद हजूर।
करनी तो गारा करे, साहबका घर दूर ॥
कबीर—बाणी तो पानी भरे, चारो वेद हजूर।
चूको सेवा बन्दगी, किया चाकरी दूर ॥
उस बाणीने सर्व मनुष्योंके मनमें अभिमान और अहंकार भर दिया। जब मनुष्य कामनाके आधीन होता है तब वस्तुको इतनी हानि होती है : तप, सत्य, शौच, लक्ष्मी, लज्जा, बुद्धि, सुकृति और आयु।