कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 792, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकारके लोग हो गये। जिन्होंने पहले दोनों दण्डवतों की थीं, वे इमानदार होकर जीते एवं ईमानसेही मरते हैं। दूसरे वे जिन्होंने न पहली दण्डवत की और न दूसरी वे काफिर होकर जीते और काफिर होकरही मरते हैं। तीसरे वे लोग हैं जिन्होंने पहली दण्डवत कीनी दूसरी नहीं की वे ईमानदार होकर जीते तथा काफिर होकर मरते हैं। चौथे वे लोग हैं कि, जिन्होंने पहली दण्डवत न की दूसरीकी, वे काफिर होकर जीते और ईमानदार होकर मरते हैं। इसके पीछे संसारके सब उद्यम दिखलाये गये। जिसने जो चुन लिया वही उसका उद्यम होगा। फिर सब आत्मायें गुप्त परदेमें विलुप्त होगईं। एक बार उत्पन्न हो चुकीं दूसरी बार उसीके अनुसार उत्पन्न होकर मरती जाती हैं।
समीक्षा—अब यहाँ विचारना उचित है कि, पूर्व जन्मके कर्मही खुदा तथा बन्दः को पृथक् २ करते हैं। सब मनुष्योंने इस कारण न्यारी न्यारी रीति-योंपर दण्डवतें कीं। क्यों कि, उनकी आत्मा पूर्वकर्मोंसे दूषित थीं। पूर्वकर्मके बिना भिन्न भिन्न प्रकारके विचार नहीं हो सकते कर्म बिना देह भी नहीं हो सकती। अतः वे सब आत्मा पूर्वकर्मोंसे निर्दोष कही नहीं जा सकती। यदि उनमें पूर्वजन्मका दोष न होता तो वे निश्चय एकही रूपसे दण्डवत करते।
सभी जीवोंकी यही दशा है कि, महाप्रलयके समय सब ब्रह्मसे जा मिलते हैं। इसी प्रकार फिर उत्पत्तिके समय ब्रह्म सत्तासे सबकी उत्पत्ति होती है। आदमकी पीठ ही गुप्त संसार है। इसी प्रकार उत्पत्ति स्थिति तथा विनाश हो जाया करता है। सदैव आवागमनका सिलसिला चला जाता है, अब यह बात प्रमाणित हुई कि, खुदाने उनको पत्थर पूजना बताया वह काला पत्थर उनके हाथमें दिया कि वह महाप्रलयके दिवस उनकी भलाई बुराईके हिसाबकी साक्षी देगा। इसी पत्थरकी पूजा आजतक हिन्दू तथा मुसलमानोंमें प्रचलित है, सब पूजते चले आते हैं। मुसलमान उसे सङ्ग आसूदके नामसे पूजते हैं। यद्यपि पूजनेकी रीति न्यारी है। पर दोनोंकी एकही बात है। जो आत्मायें उत्पत्तिके आरम्भसेही मूर्तिपूजक हुईं वे कर्मोंसे पृथक् कैसे मानी जा सकती हैं? सङ्ग आसूदको ही सालिग्राम कहते हैं।
३-४यथार्थ तालपर्य—पहले लिखा है कि, उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्व सर्व आत्माओंका भाग्य ठहराया गया। फिर कहा है कि, महाप्रलयका दिवस पचास सहस्र वर्षका होगा। इन दोनोंका एकही तात्पर्य है कि, महाप्रलयसे पचास सहस्र वर्ष पीछे फिर उत्पत्ति होती है सर्व आत्मायें निजकर्मनुसार जुदी २ योनियोंमें आवागमन किया करती हैं भिन्न भिन्न स्वरूपोंमें वेही सब अत्मायें पुनः दिखाई देती हैं। उसका यथार्थ तात्पर्य यही है।