कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 80, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपिता करके नाम ले' यह इसका पिता अर्थात् हमारा पिता पुत्रका आंतरिकभाव है सो चिरस्थायी रहे और हम अपरिमित ऐश्वर्यके स्वामी हों यह आहुति भली प्रकार गृहीत हो । हे रुद्रदेव ! जो तुम्हारा प्रलयकारी दुष्टनाशक उत्कृष्ट नाम है हे हवि ! उस रुद्रनाममें तुम हुत हो तुम हमारे घरमें आहुत होते हो, इस कारण सब प्रकार हमारे उपकारी हो अर्थात् गृहदाह वज्रपात आदिसे रक्षा करो, यह आहुति भलीप्रकार गृहीत हो ।
इसके अतिरिक्त देखो मनुस्मृतिके पहले अध्यायमें स्पष्टरूपसे लिखा है कि वेद, विद्या, आदि संसारादि सब कुछ पहले ब्रह्माने बनाया ।
अब भली भाँति प्रमाणित हो चुका कि, वेदका प्रगट करनेवाला ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा के अतिरिक्त और कोई ठहर नहीं सकता ।
सोलहवाँ प्रकरण
वेदके सात करोडमंत्र
जब पहले पहल यह जीव अपने स्वरूपसे गिरा-तब सात मार्ग स्थिर हुए. वे ये हैं-१ उत्पत्ति । २ स्थिति । ३ प्रलय । ४ कर्म । ५ उपासना । ६ योग । ७ ज्ञान । प्रत्येक पर एक एक करोडमहामंत्र ठहरे, सो वे ही सात करोड महामंत्र वेद ठहरे । अतः ये वेद सात करोड महामंत्र हैं और इन मंत्रोंमें अतुलनीय बल तथा महा प्रभाव है तथा समस्त संसारकी मर्यादा इन्हीं महामंत्रों द्वारा स्थित है । ये सात करोड महामंत्र जब अपने पिता स्वसंवेदसे निलकर अव्यक्त से व्यक्त हुए, तब उनका स्वरूप तथा कर्म कुछ औरही था । स्वसंवेद जो अपार समुद्र है, उसके एक बूँदके स्वरूपमें प्रगट होकर पृथ्वीपर फैल गया । समस्त संसारका सब कुछ कामधाम कारखाना इन्हीं सात करोड महामंत्रोंपर है और इन्हीं महामंत्रों द्वारा, मनुष्य दाससे स्वामी बन जाता है और यही सात करोड मंत्र समस्त संसारके पथ प्रदर्शक ठहरे ।
सत्रहवाँ प्रकरण
वेदोंका सार
अब मैं इन वेदोंका सार वर्णन करता हूँ कि, ये कैसे और कहाँसे पहले बनाये गये । इन चारों वेदोंका नाम परसमवेद है — और इन्हींको पराकृत वेदभी कहते हैं । स्वसंवेदसे जिस प्रकार यह परमवेद निकले उसका वर्णन सुनो । प्रथम स्वसंवेद