भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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चौथे गुरु-गोसाई सहतेजीजी पृथ्वीपर आपका नाम है, और लोकमें हिरस्सर अंश कहते हैं, उनका अथर्वण वेद है आप पश्चिमदेश शालमल्लीद्वीप और मानपुर नगरमें प्रकट होवेंगे और बीजक ज्ञानके अनुसार उनका पंथ चलेगा।

उन्नीसवाँ प्रकरण

स्वसम्बेदका वर्णन

कबीर साहबने जो अपने इन चार चेलोंको चार वेद दिया और उन लोगोंने उनके अनुसार पन्थ चलाये, सो उन चारों वेदोंकी वह सूत्रत अलग है। ये चारों वेद तो स्वसंबेदके समान स्वच्छ तथा पवित्र हैं और उनके निर्माणकर्त्ता स्वयम् कबीर साहब हैं और दूसरे किसीका विचार उसके साथ संयुक्त नहीं है। इसमें केवल कबीर साहबकी वाणी है। और अन्याय पूर्वोक्त वेद निरञ्जनके विचारोंके साथ मिलगये हैं-अतः वे चारों वेद कबीर धर्मसे पृथक् कर दिये गये, उनका अनुसरण कोई कबीरपंथी नहीं करता है।

बीसवाँ प्रकरण

वेदरक्षक वेदव्यास

चार गुरुओंको चार वेद सत्यगुरुने दिये, वे निष्कलंक तथा पवित्र हैं, उनमें किसी प्रकारका धोखा नहीं और वे चारों वेद निर्मल हैं और जो चारों वेद निरंजन द्वारा मिलौनी करके बने हैं, वेही समस्त संसारमें प्रचलित हैं और उन्हींकी आज्ञा मनुष्य जाति मानती चली आई है।

सांसारिक मनुष्य इन वेदोंकी यथार्थताको न जानकर कालपुरुषके जालमें फँस गये। ये वेद भी तो गुप्त हो चुके थे. कि, उनपर बड़ी २ कठिनाइयाँ पड़ीं और महान २ आपत्तियाँ आयीं तथापि वर्तमान वेदके उद्धारक व्यासजी हुए जिन्होंने स्थान २ से वेद मंत्रोंको एकत्रित करके एक लाख श्रुतियाँ बटोरी, इन एक लाख श्रुतियोंमें अस्सी हजार तो कर्मकाण्डकी श्रुतियाँ हैं और सोलह सहस्र उपासना तथा चार सहस्र ज्ञान काण्डकी हैं। ये लाख श्रुतियाँ हुईं। सो व्यासजीकी कृपासे ये लाख श्रुतियाँ कुछ दिवसोंतक प्रचलित रहीं हिंदुओंके राज्य तथा शासन कालमें इनका प्रचार अधिक था। इन लाख श्लोकोंके घटते २ अब वर्तमान कालमें बहुत थोडे और नाम मात्रको रह गये हैं. वेदोंमें इतनी बाधाएँ पड़ीं कि, जिससे ये विलोपित हो जाते-पर कुछ मंत्र जो अब बचे खुचे हैं उनमें भी पतित मनुष्य